कल खबर मिली थी, कि राजा और महाराजा के बीच जंग हो गई. राजा दिग्विजय सिंह और महाराजा सिंधिया दोनों टिकटों के लिए दिल्ली में लड़ पड़े. लड़ाई इतनी भयंकर हुई, कि राहुल गांधी को बीचबचाव के लिए आना पड़ा. ये सबकुछ दिल्ली में एक बंद कमरे के भीतर हुआ, जिसका कोई सबूत नहीं था.गवाह थे तो वे सामने नहीं आएंगे. इसलिए जब मीडिया में ये खबर आई, तो दिग्विजय सिंह ने इस खबर का खंडन कर दिया. कहा, कि ऐसा कुछ हुआ ही नहीं है. लेकिन एक बार मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह चाहकर उनकी लड़ाई को छिपा नहीं पाए थे. मीडिया के कैमरे में वो फटे कुर्ते में कैद हो गए थे और तब उन्होंने कहा था. राजनीति में सब होता रहता है. किसके फाड़ा था मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह का कुर्ता ? किससे हुई थी लड़ाई ?

बात उस वक्त की है, जब मध्यप्रदेश से छत्तीसगढ़ को अलग कर एक नए राज्य का निर्माण किया जा रहा था. केंद्र में बीजेपी शासित अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली सरकार थी और मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री थे कांग्रेसी राजा दिग्विजय सिंह. जब नए राज्य के निर्माण की बात होने लगी, तो छत्तीसगढ़ के इलाके से आने वाले कई कांग्रेसी नेताओं की आशा आकांक्षाएं कुलाचे भरने लगी. सब नए राज्य का मुख्यमंत्री बनने का सपना देखने लगे. इस सूचि में विद्याचरण शुक्ल अपने आप को सबसे प्रबल दावेदार मानकर चल रहे थे. और हो भी क्यों ना, वे राज्य के सबसे सीनियर और अनुभवी नेता थे और पार्टी के आलानेताओं के करीबी भी. लेकिन उनको झटका उस वक्त लगा जब 31 अक्तूबर को राज्य से पूर्व आईपीएस, आईएएस और गांधी परिवार के करीबी अजीत जोगी को नए राज्य का मुख्यमंत्री चुन लिया गया.

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दिग्विजय सिंह

ये खबर लगते ही विद्याचरण शुक्ल का गुस्सा सातवे आसमान पर चला गया और वे तिलमिलाते और तमतमाते हुए अपने फार्महाउस पर चले गए. कांग्रेस ने उस वक्त गुलाम नबी आजाद, प्रभा राव को पर्यवेक्षक बनाया था. वे शुक्ल को मनाने के लिए उनके फार्महाउस पर पहुंचे. साथ में पृथक राज्य मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह भी गए थे. फार्म हाउस पर शुक्ल के समर्थकों का तांता लगा हुआ था. जोगी के सीएम बनने की खबर से उन्हें भी उतना ही सदमा लगा था, जितना उनके नेता को. तीनों नेताओं के कार से उतरते ही शुक्ल के समर्थकों ने नारेबाज़ी शुरू कर दी. कार्यकर्ता हंगामा करने लगे.

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गुस्साए कार्यकर्ता गुलाम नबी आजाद, प्रभा राव और दिग्विजय सिंह से उलझ पड़े. बात खींचातानी और झूमाझटकी तक पहुंच गई थी. धक्का-मुक्की इतनी ज्यादा थी, कि सुरक्षा में लगे दिग्विजय सिंह के सुरक्षा कर्मी भी पसीना-पसीना हो गए थे. जैसे-तैसे तीनों नेता फार्म हाउस के उस कोपभवन में पहुंचे जहां गुस्से से लाल विद्याचरण शुक्ल बैठे हुए थे. तीनों नेताओं ने शुक्ल से क्या बात की? शुक्ल ने उनकी बातों का क्या जवाब दिया ? ये बातें सिर्फ उन चार लोगों को ही पता थी. अंदर क्या हुआ? किसी को पता नहीं चला. लेकिन जो हुआ वो कितना भयंकर था, उसकी गवाही दिग्विजय सिंह जब बाहर निकले तो मिल गई.

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दिग्विजय सिंह

दरअसल कमरे से बाहर निकले दिग्विजय सिंह का कुर्ता फटा हुआ था. उनका ये हाल मीडिया के कैमरे में कैद हो चुका था. अब बारी पत्रकारों के सवालों की थी. दिग्विजय सिंह के पास इस बात को छिपाने का कोई ज़रिया नहीं था. इसलिए उन्होंने पत्रकारों से कहा, ये राजनीति है और इसमें ये सब चलते रहता है. तब दिग्विजय सिंह मुख्यमंत्री थे. पार्टी में उनकी पूछ थी. लेकिन आज हालात बदल गए हैं. परिक्रमा कर नर्मदा को नापकर आने वाले दिग्विजय सिंह इन दिनों पार्टी में हाशिए पर हैं. 2013 चुनाव के दौरान का वो दिन भी मुझे याद आ रहा है, जब पार्टी दफ्तर में नेताओं की बैठक चल रही थी और दिग्विजय सिंह दरवाजे पर दरवाजा खुलने का इंतज़ार करते खड़े हुए थे. तब पार्टी के अध्यक्ष सुभाष यादव के बेटे अरुण यादव थे और आज कमलनाथ है. आपको हमारा ये चुनावी किस्सा कैसे लगा. कमेंट करके ज़रूर बताएं.

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