उत्तर प्रदेश में सुप्रीम कोर्ट ने थर्ड जेंडर वोटर के रूप में किन्नर मतदाताओं के लिए एक बड़ा फैसला लिया है. सुप्रीम कोर्ट के फैसले के अनुसार इस बार कोई भी किन्नर पुरुष या स्त्री श्रेणी की बजाय उनके नाम अन्य की श्रेणी में अंकित होंगे. अब तक किन्नर मतदाता स्त्री या पुरुष की श्रेणियों में शामिल रहा करते थे. सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के बाद लोकसभा और राज्यसभा की ओर से बिल पारित होने के बाद चुनाव आयोग ने भी सैकड़ों साल पुरानी अवधारणाओं को तोड़ते हुए किन्नरों को अलग पहचान देने का फैसला किया.

साल 2014 में लिए गए फैसले के तहत चुनाव आयोग ने ये व्यवस्था की है कि किन्नरों को उनके लिंग के तौर पर अब पुरुष या स्त्री लिखने की बाध्यता नहीं होगी. अब किन्नर मतदाता लिंग के रूप में अन्य लिख सकते हैं. इससे अब अन्य के रूप में दर्ज मतदाता मतदान भी करेंगे और चुनाव भी लड़ सकेंगे.

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आपको बता दें कि देश में 2002 में पहली बार किसी किन्नर प्रत्याशी ने मध्य प्रदेश के सुहागपुर विधानसभा क्षेत्र से जीत हासिल की थी. शबनम मौसी के नाम से प्रसिद्ध इस पहले किन्नर ने अपनी जीत पर खुशी जाहिर करते हुए तब कहा था कि एक ऐसे समाज को पहचान देकर जो सदियों से तिरस्कार एवं भेदभाव का शिकार रहा है, चुनाव आयोग ने प्रशंसनीय कार्य किया है.

शबनम मौसी ने ये भी कहा था कि किन्नर समाज को तिरस्कार से बचाने में निश्चित तौर पर ये एक बड़ा कदम है लेकिन इस दिशा में अभी काफी कुछ किए जाने की जरूरत है. उसी समय शबनम मौसी की ओर से किन्नर समाज को लोकसभा एवं विधानसभाओं में आरक्षण दिए जाने की मांग अब तक इस समाज की सबसे बड़ी मांगों में से एक है.

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