इसके साथ ही ईश्वर चंद्र विद्यासागर कॉलेज में भी तोड़फोड़ हुई है. जिसके बाद से ही बीजेपी और तृणमूल कांग्रेस के बीच आरोप-प्रत्यारोप का सिलसिला शुरू हो गया है. यहां तक कि पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने अपने ट्विटर हैंडल पर तस्वीर बदलकर ईश्वर चंद्र विद्यासागर की तस्वीर लगा दी है.

लेकिन क्या आप जानते हैं कि जिस विद्यासागर को लेकर बंगाल में इतना बवाल मचा हुआ है ये शख्सियत आखिर है कौन. अगर नहीं तो चलिए जानते हैं भारतीय इतिहास में विद्यासागर का क्या स्‍थान है. भारतीय इतिहास में ईश्वर चंद्र विद्यासागर को शिक्षक, फिलॉसोफर और समाज सुधारक जैसे कई रूपों में याद किया जाता है. उनका जन्म 26 सितंबर 1820 को बंगाल के मेदिनीपुर जिले में एक गरीब ब्राह्मण परिवार में हुआ था. उन्होंने अपनी पढ़ाई स्ट्रीट लाइट  के नीचे बैठकर की है, क्योंकि उनका परिवार गैस या दूसरी कोई लाइट खरीद नहीं सकता था, लेकिन उन्होंने कम सुविधाओं में ऐसी पढ़ाई की जो आज एक मिसाल है.

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शुरुआती पढ़ाई के बाद 1829 में वे कोलकाता के संस्कृत कॉलेज में पढ़ने आए. यहां 1839 में एक प्रतियोगिता में उनके तेज बुद्ध‌ि को देखते हुए उन्हें विद्यासागर उपनाम दिया गया. साल 1941 तक करीब 12 साल तक अध्ययन के बाद उन्हें कलकत्ता के संस्कृत कॉलेज में संस्कृत के प्रोफेसर की नौकरी मिल गई. फिर वो इसी कॉलेज के प्रिंसिपल बन गए. उनके कार्यकाल के दौरान कॉलेज सुधार का स्थान बन गया था. यही नहीं केवल 21 साल की उम्र में उन्हें फोर्ट विलियम कॉलेज में संस्कृत के हैड ऑफ डिपार्टमेंट चुन लिया गया.

बताया जाता है कि उनके लगातार दबाव के कारण ही ब्रिटिश सरकार विधवा विवाह कानून बनाने के लिए मजबूर हुई थी. इस कानून के लिए शुरुआत में उन्होंने अकेले ही मुहिम चलाई थी, लेकिन देखते ही देखते ही उनके साथ हजारों और लोग भी जुड़ते गए. विद्यासागर को मिलते इस भारी समर्थन से सरकार मुश्किल में फंस गई. उनकी कोशिश का ही नतीजा रहा कि रूढ़ीवादी हिन्दू समाज के विरोध के बावजूद भी सरकार ने 1857 में विधवा विवाह एक्ट लागू किया. इसके साथ ही विद्यासागर ने लड़कियों की पढ़ाई के लिए भी कई अहम कदम उठाए थे.

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