रोजा क्या है ? आप कहेंगे रमजान के पवित्र महीने में ईश्वर की उपासना में रखा जाने वाला व्रत या उपवास। रोज़ा इतना कठिन होता है, कि इसे रखना हर किसी के बस की बात भी नहीं। लेकिन रोज़े का जो मतलब और परिभाषा गुजरात में स्कूली बच्चों को पढ़ाई जा रही है, वो आप सुनेंगे तो पहले तो आप हैरान हो जाएंगे और फिर हो सकता है, कि गुस्से से लाल भी हो जाए।

      ‘रोज़ा एक घातक और संक्रमक बीमारी है,जिसमें दस्त और उलटी आती हैं’

हिन्दी की बुक पेज न013

गुजरात के सरकारी स्कूलों में बच्चों को रोज़े की ये परिभाषा सिखायी जा रही है। और रोज़े की ये विवादित परिभाषा गुजरात स्टेट स्कूल टेक्स्ट बुक बोर्ड ने अपनी चौथी कक्षा की हिन्दी की पुस्तक में छापी है। जहां बच्चे रोज़े का यही मतलब सीख रहे हैं। राज़े का ये शब्दार्थ हिन्दी की किताब के पेज नंबर 13 पर आपको देखने को मिलेगा।

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अभी हाल में आईसीईएससी बोर्ड की एक किताब में मस्जिद को शोर की वजह बताया गया था और अब गुजरात स्टेट की किताबों में रोजे के बारे में ये विवादित तथ्य लिखा गया है। हालांकि TOI ने जब गुजरात स्टेट स्कूल टेक्स्ट बुक बोर्ड के चेयरमेन नितिन पठानी से इस मामले में सफाई मांगी गई, तो उन्होंने इसे ‘प्रिंटिग एरर’ बताकर पल्ला झाड़ लिया। उनके मुताबिक जहां ‘रोज़ा’ लिखा गया है, वहां ‘हैज़ा’ लिखा जाना था। उन्होंने ये भी बताया, कि 2015 के एडिशन में ईदगाह चैप्टर में ऐसा नहीं छपा था। ये प्रिंटिंग एरर इसी साल 2017 की टेक्स्ट बुक में ही हुआ है। इसकी 15 हजार से ज़्यादा कॉपियां छापी गई है। हालांकि अभी तक GSSTB को इस मामले में कोई शिकायत नहीं मिली है।

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इधर अहमदाबाद के ‘राइट टू एजुकेशन’ (RTE) फोरम का नेतृत्व करने वाली मुजाहिद नफीस मामले को अफसरों के सामने उठाने की तैयारी कर चुकी हैं। साथ ही फोरम GSSTB और राज्य सरकार के खिलाफ शिकायत दर्ज कराने की योजना भी बना रही हैं। आपको बता दें कि GSSTB इससे पहले भी 9वीं क्लास की हिन्दी की किताब में ईसा मसीह के बारे में विवादित लेख छाप चुका है, जिसे भी प्रिटिंग मिस्टेक बताया गया था। इस मामले में GSSTB की काफी किरकिरी हुई थी।