रिश्ते में तो हम तुम्हारे बाप लगते हैं, नाम है- ….. । यहां आप अपना नाम भर सकते हैं। ये खाली जगह आपको ये अहसास दिला देगी कि इस जमाने में एक अच्छा पिता बनना कितना मुश्किल है। सभी दिनों की तरह एक दिन उनके लिए भी होता है, इस दिन संतान अपने पिता को हैपी फादर्स डे बोलकर ये अहसास करा देती है, कि वे अब बड़े होने लगे हैं। लेकिन क्या ये आपको पता है कि पिता और बेटे का रिश्ता बदलते वक्त के साथ कितना बदल गया है।

कहतें हैं, कि पिता और उनके बच्चों में एक अनकहा, अनबुझा सा संबंध होता है। पिता कभी बताता नहीं कि वो अपने बच्चों से कितना प्यार करता है। लेकिन कभी अगर उसके बच्चे की तबीयत खराब हो जाए या फिर हल्की सी भी चोट लग जाए, तो उससे ज्यादा परेशान भी कोई नहीं होता। कहते हैं पिता के प्यार को अगर देखना हो तो उसके उम्र के साथ-साथ बढ़ती झुर्रियों को देखो जिसमें उसका स्नेह, त्याग, समर्पण, फ़िक्र सब सिमटा हुआ दिखेगा।

पिता पर मशहूर लेखिका “दर्शवना” ने क्या खूब लिखा है-

“ज़िंन्दगी की रफ़्तार भी कभी ऐसी थी, पापा के स्कूटर के आगे खड़ी, मैं दुनिया पीछे छोड़ देती थी”।

मुझे आज भी याद है, मैं किस तरह अपने पिता के बुलेट पर आगे बैठकर घूमा करता था। शाम को पापा के आने का इंतज़ार करना और उनके जूतों की आवाज़ सुनकर झूठे ही किताबें खोलकर पढ़ने बैठ जाना। संडे को उनके साथ घूमने जाना। चोट लगने पर पहले डांट सुनने का डर और उसके बाद मेरी पसंदीदा खाने की खुशबू, मुझे आज भी सब याद है। मैं आज भी मोटरसाइकिल चलाने में हो या फिर कार चलाने में अपने पिता को अपना गुरु मानता हूं। मुझे संस्कार और सलीका देने के लिए उनको प्रणाम करता हूं।

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लेकिन अब वक्त बदल चुका है। वो दौर गया जब फिल्म में भी पिता अपने लाडले से कहता था-

“तुझे सूरज कहूं या चंदा, तुझे दीप कहूँ या तारा,

मेरा नाम करेगा रौशन, जग में मेरा राज दुलारा”….

1969 में आई फिल्म एक फूल दो माली के इस गाने में एक पिता की आकांक्षाओ की झलक मिलती है। न भूलने वाला ये गीत पिता का अपने बेटे के लिए स्नेह दिखता है। ये उस वक्त की बात है, जब बच्चे अपने पिता के चरणों में ही संसार बसा लिया करते थे। जब पिता की आकांक्षाओं को बच्चे अपने सर आखों पर रखते थे। जब बच्चे बच्चे हुआ करते थे और पिता पिता हुआ करते थे।

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लेकिन ज़माना थोड़ा बदला तो बाप बेटे का ये रिश्ता भीबदल गया- फिल्मों में भी इसकी छाप आपको देखने को मिल जाएगी- पिता जिन्हें बाबा कहते थे वे डैडी बन गए। और फिर लाडला कहने लगा-

पापा कहते हैं बड़ा नाम करेगा, बेटा हमारा ऐसा काम करेगा,

मगर ये तो कोई न जाने, की मेरी मज़िल है कहाँ।

लड़कों ने पिता को पीछे छोड़ अपनी मंजिल खुद चुननी शुरू कर दी थी। इस दौर में बच्चों और पिता में दोस्ती का रिश्ता बनने लगा। पिता अब पिता ही नहीं बल्कि अपने बच्चों के दोस्त भी बनने लगे थे। ज़माना कुछ अलग हो चला था। आदर, इज़्ज़त, थोड़े से डर के साथ अब दोस्ती ने भी पिता और बच्चों के रिश्ते में अपनी जगह बनानी शुरू कर दी थी। नए रास्तों की खोज वो अब खुद ही करना चाहते थे। पिता के सपनों से ज़्यादा अहमीयत वो खुद के सपनों को देने लगे थे। अब वो समय आ चला जब बच्चे पिता को सिखाने लगे थे।

धीरे धीरे रिश्तों की परिभाषाएं और भी बदलने लगी। ज़माना स्मार्टफोन और इंटरनेट का आ चला था। ये वो वक्त है जब बच्चों को बापू हानीकारक लगने लगे हैं। दंगल फिल्म का ये गाना बदलते दौर में पिता और बेटे की रिश्ते को बखूबी दिखाता है। बच्चे अब पिता के बाप बनने लगे हैं। हर मामले में वे उनसे दो कदम आगे हैं। खुद ही राह बनाने के साथ उसपर चलने के लिए अब उन्हें पिता की उंगली की ज़रूरत नहीं है। उंगली थामकर कदम से कदम मिलाकर चलने वाले कदम जब बुढ़ापे में लड़खड़ाने लगते हैं, तो बेटा बेझिजक उन्हें वृद्धाश्रम भेज देता है। मां-बाप को छोड़कर विदेश में बसने में उसे अब थोड़ा भी संकोच नहीं होता। वक्त के साथ बदलती औलाद का दर्द एक पिता के इन अल्फाज़ों से समझा जा सकता है-

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जो अश्क गूंगे थे, वो अर्ज़े हाल करने लगे,

हमारे बच्चे खुद हमहि से सवाल करने लगे।

लेकिन कहा जाता है की वक़्त वक़्त की बात है और ये वक़्त भी बदलेगा। हालांकि ये बात हर किसी पर लागू नहीं होती। आज भी बहुत से बच्चे ऐसे हैं जो अपने पिता को भगवान का रूप मानते हैं। वे अपने पिता की आकांक्षाओं, सपनों को अपनी महत्वकांक्षाओं से बढ़कर समझते हैं और उन्हें पूरा करने के लिए अपना जीवन खपा देते हैं। क्योंकि वो बच्चे ये जानते हैं कि एक दिन उन्हें भी पिता बनना है और वे नहीं चाहेंगे कि उनकी औलाद उन्हें हानीकारक बापू समझकर उनका तिरस्कार करे।

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