बिहार में बहार है, नितिश कुमार है…वाला दौर अब चला गया है। अब बिहार में बहार है, फतवों की बौछार है कहना पड़ेगा। सरकार बदली तो समीकरण भी बदल गए और तो और इसके साथ लोगों की सोच भी बदलने लगी है। पहले संसद में ‘जय श्रीराम’ के नारे लगे, फिर राष्ट्रपति के शपथ ग्रहण में और बिहार में नितिश कुमार और बीजेपी ने मिलकर फिर सरकार बनाई तो विधानसभा में ये नारा गूंज उठा, लेकिन दिक्कत ये है, कि ये नारा एक मुसलमान ने उछाला था। बस फिर क्या था, एक मौलवी साहब को इस पर गुस्सा आ गया और उन्होंने फतवा जारी कर दिया।

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मुफ्ती की ओर से जारी फतवा

ये फतवा बिहार में नीतीश सरकार के अल्पसंख्यक कल्याण और गन्ना उद्योग मंत्री खुर्शीद उर्फ फिरोज अहमद के खिलाफ जारी किया गया है। इमारत-ए-शरिया के मुफ्ती सुहैल अहमद कासमी ने मंत्री के खिलाफ ये फतवा दिया है। और इसमें उन्होंने खुर्शिद को इस्लाम से खारिज कर दिया है। फतवे के मुताबिक मंत्री की बीवी भी अब उनकी नहीं रही, क्योंकि उनका निकाह भी रद्द हो गया है। अब उन्हें अपनी बीवी को फिर से बीवी बनाने के लिए दोबारा निकाह करना पड़ेगा, फिर इस्लाम कबूल करना पड़ेगा और माफी भी मांगनी पड़ेगी।

खुर्शिद उर्फ फिरोज अहमद अल्पसंख्यक कल्याण मंत्री बिहार

इधर विश्वास मत के दिन विधानसभा परिसर में जय श्रीराम का नारा बुलंद करने वाले मंत्री जी फतवे के बाद भी अपने बयान पर कायम हैं। उन्होंने ये तक कहा, कि वे ऐसे फतवों से नहीं डरते हैं। उनकी माने तो वे बिहार के विकास और सामाजिक सौहार्द के लिये 100 बार जय श्रीराम के नारे लगाएंगे। हालांकि ‘इमारत-ए-शरिया’ ने इस फतवे से इंकार कर दिया है, और इसे मुफ्ती सुहैल अहमद कासमी की निजी राय बताया है। इमारत-ए-शरीया के उप नाजिम मौलाना सुहैल अहमद नदवी ने बयान जारी कर कहा है, कि इस फतवे का ‘इमारत-ए-शरीया’ से कोई लेना-देना नहीं है, ये उनकी निजी राय है।

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आपको बता दें, कि खुर्शीद पश्चिमी चंपारण जिले के सिकटा विधानसभा के विधायक हैं। उन्होंने विधानसभा परिसर में कैमरे के सामने हाथ में बंधा रक्षासूत्र दिखाते हुए ये तक कहा था, कि महागठबंधन से अलग होने के लिए उन्होंने मनोकामना मंदिर में मन्नत मांगी थी। दरअसल इस तरह के फतवे पहले भी मौलवियों के ओर से जारी किए जाते रहे हैं। सोनू निगम का मामला हो या फिर गायिका नाहिद आफ़रीन का ऐसे फतवे आते रहे हैं। लेकिन जो लोग इन फतवों को जारी करते हैं। शायद उन्हें ही फतवे का असल मतलब पता नहीं है। क्योंकि इस्लाम में फतवा शब्द किसी के लिए खिलाफ जारी की जाने वाली चेतावनी या उसके बहिष्कार का आदेश नहीं देता ही नहीं।

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