भारत देश को आजाद हुए पूरे 70 साल हो चुके हैं। 15 अगस्त को हर साल हम सब आजादी का जश्न मनाते हैं और तिरंगा फहराकर देश के लिए शहादत देने वालों को याद करते हैं। लेकिन इसी देश में कई हिस्से ऐसे भी हैं, जहां आजादी के इतने बरस बाद भी आजादी की किरण नहीं पहुंची हैं। यहां के वासियों ने तिरंगे को लहराते नहीं देखा है और आजादी का जश्न किसी चिड़िया का नाम है, ये भी ये नहीं जानते हैं। ऐसे ही इलाकों में से एक है, छत्तीसगढ़ का अबूझमाड़। जैसा की इस इलाके का नाम है, इसे आज तक सरकार भी नहीं बूझ पाई है। दुर्गम जंगली इलाके में फैले इस क्षेत्र में जनताना सरकार चलती है। यानी माओवादियों की सरकार, इऩका अपना कानून है, अपना झंडा और अपनी अलग सल्तनत।

Demo pic-अबुझमाड़ में जनताना सरकार

हालांकि इस अबूझमाड़ के जंगलों के कई गांवों तक सरकार ने फोर्स के दम पर अपनी पहुंच कायम कर ली है, लेकिन कई गांव ऐसे हैं, जहां पुलिस और सरकार के लिए पहुंचना भी नामुमकिन ही है। घोर नक्सल प्रभावित इलाके के जिले बीजापुर का एक ऐसा ही गांव है बड़े तुंगोली, जहां के बाशिंदों ने तिरंगे को फहरते नहीं देखा था। यहां हर साल 15 अगस्त के दिन नक्सली काला झंडा फहराकर इस दिन का विरोध करते थे। लेकिन इसबार पुलिस के जवानों ने 70 साल बाद इस नक्सलियों की मांद में घुसकर न सिर्फ तिरंगा फहराया बल्कि गांव वालों उनके आजाद होने का अहसास भी कराया।

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झंडा फहराने गया लेडी कमांडो दस्ता

आजादी के 70 साल बाद इस इलाके के लोगों के लिए 15 अगस्त का दिन एक नया सवेरा लेकर आया था। ये दिन न सिर्फ छत्तीसगढ़ के इतिहास में बल्कि इन लोगों के जीवन में भी अविस्मरनीय बन गया है। गांव के लोग उस पल के साक्षी बने जिस वक्त यहां तिरंगा शान से लहराया। फक्र की बात ये है, कि नक्सिलियों के गढ़ में घुसकर उन्हें चुनौती महिला कमांडोज़ के दस्ते ने दी। अदम्य साहस का परिचय देते हुए, ये महिला कमांडोज़ इस दुर्गम इलाके में घुसी और नक्सलियों की मौजूदगी और उनके हमले की परवाह किए बिना उन्होंने इस ऑपरेशन को अंजाम दिया। 15 अगस्त की सुबह ध्वजारोहण के साथ ही, गांव के लोगों के हाठों पर जो मुस्कान थी और चेहरे पर आजादी का भाव था वो देखने लायक था।

ऑपरेशन तिरंगा के कामयाबी की खुशी

नक्सलियों को मंसूबे किए नाकाम

दरअसल बीजापुर जिले में कई ऐसे गांव है, जहां आजादी के बाद कई सालों से तिरंगा नहीं फहराया जाता था और ना ही यहां पर आजादी का जश्न मनाया जाता था, बल्कि नक्सलियों के कब्जे वाले इन गांवों में नक्सली काला झंडा फहराकर इस दिन का विरोध करते थे। लेकिन इस बार बीजापुर एसपी केएल ध्रुव ने इन सब गांवों में तिरंगा फहराने की योजना बनाई और इसके लिए जवानों की टीमें गठित कर ‘ऑपरेशन तिरंगा’ के तहत इन लोगों को 14 तारीख को ही इन इलाको के लिए रवाना कर दिया था। लेकिन इन सब टीमों में खास थी, वो टीम तो बड़े तुंगली गांव में तिरंगा फहराने के लिए निकली थी। दरअसल इस टीम का नेतृत्व एक महिला कमांडो कर रही थीं और इस टीम में महिला कमांडों का दस्ता शामिल था।

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बस्तर के घने जंगलों में महिला कमांडो का दस्ता

‘ऑपरेशन तिरंगा’ को ऐसे दिया अंजाम

14 अगस्त की शाम लगभग 4 बजे महिला कमांडोज की ये टुकड़ी बीजापुर मुख्यालय से गांव के लिए रवाना हुई। दुर्गम रास्तों और घने जंगलों से होते हुए, नक्सलियों की मांद में घुसना कोई मामूली काम नहीं था। लेकिन इन महिला कमांडोज़ ने अदम्य साहस का परिचय देकर उस गांव तक का सफर तय किया। इस दस्ते की अगुवाई खुद डीएसपी उन्नैजा खातून कर रहीं थीं। बीजापुर के जांगला थाने से तकरीबन 7 किलोमीटर दूर घने जंगलों के बीच ये गांव हैं, जहां  पथरीले-कटीले, किचड़ भरे रास्तों और नदी नालों को पार कर पहुंचना होता है। आपको बता दें, कि इस खास ऑपरेशन के लिए इन महिला कमांडोज़ को एक स्पेशल ट्रेनिंग दी गई थी। महिला पुलिस के इन 35 जवानों को इस साहसिक काम के लिए चुना गया और इन्हें 25 दिन की एक विशेष ट्रेनिंग दी गई, जिसमें उन्हें विपरित हालत में निपटने में दक्ष बनाया गया। शारीरिक प्रशिक्षण के साथ साथ मानसिक रूप से भी तैयार किया गया। इस स्पेशल ट्रेनिंग के बाद प्रयोग के तौर पर पहली बार नक्सलियों की मांद में भेजा गया था।

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कठिन रास्तों के गुजरता हुआ महिला कमांडो दस्ता

इसलिए महिला कमांडोज को ही चुना गया

आप सोच रहे होंगे, कि इतनी विपरित परिस्थितियों में इस खतरनाक काम के लिए महिला कमांडोज़ को ही क्यों चुना गया ? इस काम पुरुष कमांडो या पुलिस के जवान भी अंजाम दे सकते थे। तो आपको बता दें, कि बस्तर में दो दशक से भी ज्यादा वक्त से माओवादियों से पुलिस और अर्धसैन्य बलों के बीच जंग जारी है। कमोबेश जब-जब मुठभेड़ होती है, फोर्स की कार्रवाई को हमेशा कठघरे में खड़ा कर दिया जाता है। कभी जवानों पर दुराचार के आरोप लगते हैं, तो कभी आदिवासियों के घरों में आगजनी जैसे संगीन आरोपों से खाकी दागदार होती है। मानवाधिकार संगठनों के आरोपों से भी जवानों के मनोबल पर काफी असर पड़ता है। इसलिए इन सब हालातों में पुलिस के लिए एंटी नक्सल ऑपरेशन चलाना काफी कठिन हो जाता है। इसीलिए प्रयोग के तौर पर पहली बार महिला कमांडो के इस दस्ते को उतारा गया है। जिन्होंने अपने पहले ही काम को सफलतापूर्वक अंजाम देकर दिखाया है।

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