बड़ी सी मीनारें और उसपर तने हुए लाउडस्पीकर, अमूमन मस्जिद की पहचान यही होती है। मस्जिद की एक और पहचान होती है, यहां औरतें आपको कभी देखने को नहीं मिलेंगी। क्योंकि यहां औरतों को जाने पर पाबंदी होती है। जहां औरते नहीं जा सकती है वहीं गे का जाना तो नामुमकिन है।

मंदिर, मस्जिद, गिरजाघर ये सब प्रभू की इबादतगाह हैं। ईश्वर कभी किसी को आने से रोक नहीं सकता, लेकिन इंसानों ने ये खांचे खींचे हैं, जिनमें आपका फिट बैठना ज़रूरी है। अगर आप उस खांचे से थोड़ा भी इधर-उधर होते हैं तो आप इबादत या प्रार्थना नहीं कर सकते। लेकिन दुनिया के एक कोने में एक ऐसी इबादतगाह बनी है, जिसने इंसानों की बनाई हुए इन खांचों को तहस-नहस कर दिया है।

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जर्मनी में बनी ‘इब्न रुश्द गोथे मस्जिद’

इसे आप मस्जिद कह सकते हैं, भले ही इसमें ऊंची-ऊंची मीनारें नहीं बनी हैं और ना ही यहां लाउडस्पीकर का शोर है। पर अल्लाह की इबादत वैसी ही होती है, जैसी आम मस्जिदों में। चौंकाने वाली बात ये है, कि ये मस्जिद एक गिरजाघर के अंदर बनी है। बर्लिन में बनाई गई इस मस्जिद का नाम मध्यकाल के एक दार्शनिक इब्न रुश्द और जर्मनी के लेखक गोथे के नाम को मिलाकर ‘इब्न रुश्द गोथे मस्जिद’ रखा गया है।

एकसाथ नमाज़ अदा करते महिला, पुरुष और समलैंगिक

जर्मनी में बनी इस मस्जिद में जाने से पहले महिलाओं को संकोच करने की कोई ज़रूरत नहीं है, अगर आप गे हैं तो भी यहां जा सकते हैं। आप शिया है, सुन्नी है या फिर कोई और इस मस्जिद को कोई फर्क नहीं पड़ता। महिलाएं हिजाब पहनकर आए न आए ये उनकी मर्जी है। महिलाएं अगर इमामत करना चाहे तो वेलकम है।  इस मस्जिद को जर्मनी की ही 54 साल की महिला ऐत्स ने बनाया है, एत्स का पिछले 8 सालों से चला आ रहा ये संघर्ष अब खत्म हुआ है। पशे से वकील और मेन राइट्स एक्टिविस्ट सीरान एत्से की ओर से लिबरल मुस्लिमों के लिए बनाई गई ये मस्जिद अपने तरह की पहली मस्जिद है।

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हुमन राइट्स एक्टिविस्ट सीरान एत्से

इस तरह की मस्जिद के निर्माण का सपना पूरा होसे बेहद खुश ऐत्स बताती हैं-

‘इस मस्जिद का निर्माण लंबे समय से होना था। मैं मुसलमान हूं और मेरे मजहब के नाम पर इतना ज्यादा इस्लामिक आतंक फैला हुआ है, आसपास इतनी बुराई है। ऐसे समय में जरूरी है, कि मेरे जैसे आधुनिक और उदारवादी मुस्लिम लोगों के सामने आकर इस्लाम का सच्चा रूप पेश करें।’

ये मस्जिद सबक है, उन लोगों के लिए जो अल्लाह के घर आने से उनके बंदों को रोकते हैं, इंसानी कमियों और खूबियों की वजह से उन्हें अल्लाह से दूर करते हैं। एत्स की भी मंशा यही है, कि लो समझे कि ईश्वर कभी किसी में भेद नहीं करता। उसके लिए सब बराबर है।