नाम में क्या रखा है! विलियम शेक्सपियर ने जब ये लाइनें लिखीं, तब उसके नीचे वे अपना नाम लिखना नहीं भूले। मतलब नाम ही सबकुछ है। नाम नहीं तो आपकी अपनी कोई पहचान भी नहीं। बदनाम में भी नाम ही जुड़ा है। इसलिए सार ये है, कि नाम में ही सबकुछ रखा है। जैसे चल बिन मछली है, वैसे ही नाम बिना इंसान या जगह। बिना नाम के किसी की कल्पना भी नहीं की जा सकती। लेकिन भारतीय रेल का एक रेलवे स्टेशन इन सबसे उलट बिना नाम के ही अपनी पहचान बनाए हुए है। यहां रेल आती है, सवारियां चढ़ती-उतरती हैं, लेकिन इस स्टेशन का कोई नाम नहीं है।

Railway Junction without name

अपने नाम के इंतज़ार में खाली पड़े टीन का शेड और पीली पट्टी। बरसों से इनका इंतज़ार पूरा नहीं हो पा रहा है। ये गुमनाम रेलवे स्टेशन झारखण्ड में है। रांची से टोरी जाने वाली ट्रेन यहां रुकती है, उसमें लोग चढ़ते हैं और उतरते भी हैं। मतलब इस स्टेशन के लिए ट्रेन का स्टॉप है, लेकिन इसका कोई नाम नहीं है। ये बात जितनी मजेदार है, इसके पीछे की वजह भी उतनी रोचक है। सरकारी अधिकारियों की माने, तो इस जगह का नाम कानूनी किताब में है, लेकिन इससे स्टेशन पर या स्टेशन के आस पास की जगहों पर नहीं लिख सकते। नाम न लिखने की वजह, दो गावों के बीच का विवाद है। दरअसल दोनों गाव के लोगों ने इसे अपनी  इज्जत का सवाल बना लिया है। दोनों गावों के बीच ये झगड़ा 7 साल पुराना है। इसी वजह से साल 2011 में बना ये रेलवे स्टेशन, अब तक बिना नाम के ही चल रहा है।

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Railway Station without name

वैसे सरकारी दस्तावेजों में इस स्टेशन का नाम बड़की चांपी है। साल 2011 में, 12 नवंबर को पहली बार यहां से ट्रेन के आवागमन की शुरूआत हुई थी। बड़की चांपी के स्टेशन मास्टर की माने, तो रेलवे कर्मचारियों ने कई बार स्टेशन पर नाम लिखना चाहा, लेकिन वो कामयाब नहीं हो पाए। जब भी वो नाम लिखना चाहते, हज़ारों की भीड़ उनको रोकने के लिए आ धमकती। एक बार जब रेलवे कर्मचारियों ने नाम लिखने की कोशिश की, तब पेंटर बड़की तक का सफर तय भी कर चुके थे, लेकिन चांपी पर पहुंचने के पहले ही लोगों को इसकी भनक लग गई और सैकड़ो की भीड़ ने वहां पहुंचकर लिखे गए शब्दों पर कालिख पोत डाली।इस घटना के बाद से कभी भी रेलवे अधिकारियों ने स्टेशन पर नाम लिखने की कोशिश नहीं की।

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First Train from Badkichumpi

ये मसला दो गांव बड़कीचांपी और कमले के बीच का है। कमले गांव के लोग इसे अपनी ज़मीन पर बना रेलवे स्टेशन मानते हैं और इसलिए चाहते हैं, कि इसपर उनके ही गांव का नाम हो। उनकी माने तो गांव के लोगों ने न सिर्फ ज़मीन दी, बल्कि स्टेशन बनाने के लिए मज़दूरी भी की। इसलिए इसका नाम बड़कीचांपी कैसे रखा जा सकता है? आपको बता दें, कि बड़कीचांपी लोहरदगा जिले के कुडू प्रखंड की एक पंचायत है। कमले गांव भी इसी पंचायत में आता है, लेकिन रेलवे स्टेशन से बड़कीचांपी गांव की दूरी करीब 2 किलोमीटर है।

Railway Station Board without name

भले ही यहां ट्रेन कुछ देर के लिए रूकती है, लेकिन यहाँ से लोगों का हुजूम चढ़ता है और उतरता है। इस ट्रेन में कमले, बड़कीचांपी, छोटकीचांपी, सुकुमार आदि गांवों के रहने वाले लोग यहां से चढ़ते-उतरते हैं। इसके लिए वे ट्रेन की टिकट बड़कीचांपी  के नाम ही खरीदते हैं। लेकिन इस स्टेशन के बोर्ड पर उसका नाम उन्हें बर्दाश्त नहीं है। चौंकाने वाली बात ये, कि शासन-प्रशासन की सरकारी ताकत और रुआब भी इस गांव के अदने से विवाद और उन लोगों के आगे बौना साबित हो रहा है। रेलवे की ओर से इसके लिए कोई पहल न किया जाना भी कई सवाल खड़े करता है। क्या कभी इस स्टेशन को नाम नसीब होगा या फिर ये ऐसे ही गुमनामी की सफर तय करता रहेगा?

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