Indian space research organization (ISRO) का चंद्रयान 2 उड़ान भरने की तैयारी कर चुका है. भारत के साथ साथ पूरी दुनिया की नजरें इस कम लागत वाले मिशन पर टिकी हुई है. इस चंद्रयान 2 पर भारत ने 950 करोड़ रुपये खर्च किए हैं. लेकिन क्या आपको पता है कि पृथ्वी के चारों तरफ टोटल कितने सैटेलाइट हैं और उनमें से कितने भारत ने भेजे हैं.

यूनाइटेड नेशंस फॉर आउटर स्पेस अफेयर्स (UNOOSA) के अनुसार 1957 में पहले सैटेलाइट स्पूतनिक के लॉन्च के बाद से 2018 तक पृथ्वी के चारों तरफ कुल 8,378 सेटेलाइट भेजे जा चुके हैं. जिनमें से अभी 4,994 सैटेलाइट पृथ्वी की कक्षा में घूम रहे हैं. जबकि, इनमें सिर्फ 1957 सेटेलाइट्स काम कर रहे हैं. यानी 40 फीसदी से कम सेटेलाइट्स काम कर रहे हैं.

पर क्या आपको पता है कि इसरो ने अब तक कितने सैटेलाइट भेजे हैं. इनमें कितने देसी और कितने विदेशी हैं. कितने स्टूडेंट्स ने बनाए हैं और कितने रॉकेट सफल हुए हैं. किस मिशन में असफलता मिली और किस में सफलता ?

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इसरो ने अब तक स्पेस में कुल 370 सेटेलाइट छोड़े हैं. इनमें 101 देसी और 269 विदेशी सैटेलाइट हैं. मून मिशन चंद्रयान-2 अगर सफल होता है इनकी संख्या बढ़कर 371 हो जाएगी. इसरो ने देश के लिए कुल 101 सैटेलाइट लॉन्च किए हैं. जिनमें संचार, आपदा प्रबंधन , इंटरनेट, रक्षा, मौसम, शिक्षा जैसे विभिन्न क्षेत्रों को सेवाएं देने वाले सेटेसाइट शामिल हैं. आजादी के बाद किसी को क्या पता था कि देश में संचार माध्यम तेजी से बढ़ेंगे. इसरो के वैज्ञानिकों ने आजादी के बाद से अब तक संचार व्यवस्था को लेकर 41 सेटेलाइट छोड़े है. जिनमें से अभी 15 काम कर रहे हैं. संचार सेटेलाइट की लॉन्चिंग और कार्यप्रणाली को लेकर अब तक इसरो वैज्ञानिकों को सिर्फ 6 असफलताएं ही मिली हैं.

तो वहीं सन् 1988 में पहला अर्थ ऑब्जरवेशन सैटेलाइट छोड़ा गया था. तब से लेकर अब तक 36 अर्थ ऑब्जरवेशन सैटेलाइट अंतरिक्ष में छोड़े गए. इनमें से 17 अभी भारत की निगरानी कर रहे हैं.. ये सभी सेटेलाइट कृषि विकास, शहरी और ग्रामीण विकास की योजनाओं, जलस्रोत, खनिज संपदा, पर्यावरण, जंगल और आपदा प्रबंधन में मदद करते हैं. इनमें से रीसेट और कार्टोसेट सैटेलाइट्स का उपयोग पाकिस्तान में मौजूद आंतकियों पर सर्जिकल और एयर स्ट्राइक के लिए किया गया था. इन 36 मिशन में से सिर्फ 2 मिशन ही फेल हुए.

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तो वहीं इसरो  स्टूडेंट्स, यूनिवर्सिटी, कॉलेज द्वारा बनाए गए सैटेलाइट को भी स्पेस में भेजता है है ताकि बच्चों का विज्ञान के प्रति रुझान बढ़ सके. 2009 से अब तक ऐसे 10 सेटेलाइट छोड़े गए हैं,सबसे खास बात तो य़े कि  इनमें से एक भी सेटेलाइट फेल नहीं हुआ.  अनुसेट,  स्टडसेट, जुगनू, एसआरएमसेट, स्वयंम, सत्यबामासेट, पीसेट, प्रथम, एनआईयूसेट और कलामसेट-वी2 स्टूडेंट्स द्वारा बनाए गए हैं.

इसरो ने देश की सेना, नौसेना, वायुसेना, कार्गो सुविधाओं, पानी के जहाजों, छोटे नाविकों, नागरिक विमानन के लिए गगन और IRNSS-नाविक जैसे नेविगेशन सेटेलाइट लॉन्च कर चुकी है. गगन प्रणाली की सुविधाएं जीसेट-8 और जीसेट-10 के ट्रांसपोंडर्स के जरिए ली जा रही हैं. वहीं, IRNSS-नाविक के 8 सैटेलाइट काम कर रहे हैं.

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इसरो वैज्ञानिक रिमोट सेंसिंग, वातावरणीय, पेलोड डेवलपमेंट, रिकवरी टेक्नोलॉजी समेत कई आयामों पर अध्ययन करने के लिए प्रायोगिक सेटेलाइट लॉन्च किए हैं. इनमें शामिल हैं – भारता का पहला उपग्रह आर्यभट्ट, रोहिणी जो फेल हो गया था , रोहिणी RS-1, एपल, यूथसेट, आईएनएस-1बी, आईएनएस-1ए और आईएनएस-1सी.

गौर करने वाली बात ये कि इसरो के वैज्ञानिकों ने 1987 से अब तक रिमोट प्लेनेट के अध्ययन के लिए 7 सेटेलाइट लॉन्च किए हैं. शुरुआती चार सेटेलाइट प्रायोगिक थे. इसके बाद 22 अक्टूबर 2008 को चंद्रयान-1 लॉन्च किया गया. 2013 में मंगलयान और 2015 में एस्ट्रोसेट का प्रक्षेपण किया गया.

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