नेता का नाम लेते ही आज के वक्त में हमारे जेहन में एक ऐसे शख्स की छवि आती है, जो झक्क सफेद कलफ लगे कुर्ते में आलिशान गाड़ी में सवार होकर जनता के बीच आता हो। गांधी जी भी एक नेता थे, लेकिन उनके लिए ऊपर लिखी सारी चीजें कोई मायने नहीं रखती थी। ऐसे ही एक नेता और भी थे, जिन्होंने इस दुनिया को अलविदा कह दिया है। बागुन संबुरई, एक ऐसे नेता जिन्होंने अपना सारा जीवन आधे बदन कपड़े पर काट दिया। साधा जीवन, उच्च विचार के सिद्धांत पर जीने वाले बागुन संबुरई को लोग झारखंड का गांधी भी कहते थे।
Bagun Sumbrai death in Hospital
बागुन संबुरई कांग्रेस के एक जाने माने नेता रह चुके हैं। 22 जून 2018 को मल्टी ऑर्गन फेलियर की वजह से उनकी मौत हो गई। झारखण्ड के एक छोटे से कस्बे चाईबासा से वो 5 बार सांसद, 4 बार विधायक और 12 साल मुखिया रह चुके हैं। बागुन संबुरई दिल का दौरा पड़ने की वजह से पिछले 40 दिनों से रांची के Tata Memorial Hospital में भर्ती थे। बागुन संबुरई 94 साल के थे। कहा जाता है की , बागुन ने कुल 58 शादियां की थी। इनमे से कितनी शादी तो ऐसी थी, जिनके उन्हें नाम तक मालूम नहीं है। बागुन की चौथी पत्नी मुक्तिदानी अभी उनके साथ रहती हैं। बागुन ने उन्हें एक फूटबाल मैच में प्राइज के तौर पर जीता था।
Bagun Sumbrui with his wife
दैनिक भास्कर की रिपोर्ट के मुताबिक- चाइबासा में पहले मेले या फर हाट लगा करते थे। ऐसे मेले में व्यापारी आदिवासी महिलाओं का रेप या शोषण किया करते थे। ऐसे में जो लडकियां गर्भवती हो जाती थीं, उनको बागुन अपना नाम दे देते थे और उन्हें सहारा दिया करते थे। कितनी सारी महिलाओं ने उनको अपना पति बता कर नौकरी भी हासिल की थी। जबकी उन महिलाओं को जब कोई जीवन साथी मिल जाता, तो वे उनके साथ अपने नए जीवन की शुरुआत करने चलीं जाया करतीं थीं।
Bagun Sumbarai
बागुन सुंबुरई गांधीवादी विचारधारा के थे। उन्होंने झारखण्ड आंदोलन का नेतृत्व भी किया था। चिलचिलाती गर्मी हो, बरसात हो, या फिर कंपकंपाने वाली ठण्ड, वो सिर्फ एक धोती ही पहना करते थे।इसीलिए उनके जानने पहचानने वाले उन्हें गांधी कहकर ही पुकारा करते थे। वे दावा करते थे, कि राहुल गाँधी भी उनकी गोद में खेल चुके हैं। साल 1967 में वे पहली बार बिहार विधानसभा के सदस्य बने, इसके बाद वो वन उत्पाद, ट्रांसपोर्ट, खेलकूद और कल्याण मंत्री भी रहे। इसके बाद साल 1972 में वो विधायक बने। साल 1977 में पहली बार वो लोक-सभा के सदस्य बने। साल 2002 में उन्हें झारखण्ड विधानसभा का उपाध्यक्ष बनाया गया था। साल 2004-09 के संसदीय चुनाव जीतकर वो 5वीं और आखिर बार सांसद बने थे। इसके बाद उम्र और अपनी तबीयत को देखते हुए उन्होंने राजनीति से संन्यास ले लिया था। वो ऐसे एकलौते आदिवासी नेता थे जिन्होंने इंदिरा गांधी, कर्पूरी ठाकुर, लालू प्रसाद यादव जैसे दिग्गज नेताओं के साथ राजनीतीक दांव-पेंच आजमाया था।
Bagun Sumbrui in his early days
एक वक्त ऐसा भी आया था, जब बागुन सुंबुरई ने बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री दरोगा प्रसाद राय की सरकार को गिरा दिया था। वाकया 1970 का है, दारोगा राय की सरकार झारखंड पार्टी के 11 विधायकों की बैसाखी पर चल रही थी। उसी दौरान बिहार राज्य पथ परिवहन में काम करने वाले एक कंडक्टर को नौकरी से निकाल दिया था। आदिवासी कंडक्टर बागुन के पास गुहार लेकर पहुंचा, तो बागुन ने दारोगा राय से इसको लेकर कई बार मिन्नते की, लेकिन दारोगा राय सरकार ने उस कंडक्टर को नौकरी पर वापस नहीं रखा। इसी से खफा होकर पार्टी ने दारोगा राय की सरकार से समर्थन वापस ले लिया। इसके बाद प्रदेश में कर्पूरी ठाकुर के नेतृत्व में नई सरकार का गठन हुआ और इसमें बागुन को परिवहन मंत्रालय सौंपा गया। परिवहन मंत्री का पद संभालते ही उन्होंने सबसे पहले उस कंडक्टर को बहाल किया था।
Bagun Sumbarai
आपको बता दें, कि राजनीती में आने के पहले बागुन कई सारी कुरीतियों के खिलाफ सामाजिक आंदोलनों की अगुवाई कर चुके थे।बागुन सुंब्रुई सिर्फ 7वीं क्लास तक ही पढ़े थे। इसके बाबजूद उन्हें कई सारी भाषाओं का ज्ञान था। वे हिंदी के साथ ही उड़िया, अंग्रेजी, बांग्ला, संथाली जैसी भाषाएं अच्छे बोल लेते थे।
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