मध्यप्रदेश की सत्ता पर एक दशक से भी ज्यादा वक्त से बीजेपी का राज है। राज्य के मुखिया शिवराज सिंह चौहान इसे शांति का टापू बताते हैं। अपने हर भाषण में वो तेज़ी से विकास करते प्रदेश का गुणगान किए बिना नहीं रहते। प्रदेश में हो, देश में या फिर विदेश में हर जगह अपने प्रदेश की खुशाहाली का ढोल पीटते रहते हैं। लेकिन शायद वो अपने राज्य के इस गांव की बदहाल और शर्मनाक तस्वीर से अनजान हैं। 

हाथ में चप्पल उठाकर गांव से गुज़रती ये महिलाएं, उसी प्रदेश की वासी हैं, जिसे शिवराज स्वर्णिम प्रदेश कहते हैं। उसी प्रदेश का समाज वैचारिक तौर पर कितना रूढ़िवादी जकड़नों में कैद है, ये तस्वीर चीख-चीख कर बता रही है। लोकतंत्र को समानता आधारित समाज के निर्माण का सबसे कारगर रास्ता बताया गया है। लेकिन ये रास्ता दलितों के गांवों और गलियों से होकर गुज़रता ही नहीं है।

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हाथ में चप्पल लेकर गांव से बाहर जाती महिलाएं

बुंदेलखंड के टीकमगढ़ से आई ये तस्वीर हमारे समाज के साथ ही लोकतंत्र को भी मुंह चिढ़ा रही है। बाबासाहेब के संविधान का मज़ाक उड़ाती ये तस्वीर जिले के दिगौड़ा थाना इलाके के वर्माताल गांव की है। यहां दलितों को गांव में जूता-चप्पल पहन कर चलने की इजाजत नहीं है। वशंकार जाति के लोगों के लिए ऊंची जाति का फरमान है- इसलिए दलित गांव की सरहद को जूते-चप्पल हाथ में लेकर पार करते हैं।

ऊंची जाति के लोगों का ये फरमान महिला, पुरुष, बच्चे सब पर लागू होता है। चिलचिलाती गर्मी हो, बरसात या फिर कोई भी मौसम यहां के लोग पैरों में चप्पल डालने का दुस्साहस नहीं कर सकते। वर्ना इनकी सज़ा तय है। जिसने हिम्मत जुटाकर जूता या चप्पल पहनने की कोशिश की उसे गांव के सामने पीटा जाता है।  गांव में वशंकार जाति के 20 परिवार रहते हैं, आरोप है कि इनपर ये जुल्म और ज्यादती घोसी और ठाकुर समाज के लोग कर रहे हैं। चौंकाने वाली बात ये है कि गांव की सरपंच दलित हैं, लेकिन वो भी बस्ती से हाथ में चप्पल लेकर ही चलती हैं। उन्हें भी इस इलाके में चप्पल पहनने की इजाजत नहीं है। मामले की शिकायत पुलिस तक भी पहुंची है लेकिन यहां भी कार्रवाई के आश्वासन के सिवा और क्या मिलता है।

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