भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान केंद्र यानी Indian Space Research Organisation (ISRO)  के मिशन चंद्रयान-2 की उल्‍टी गिनती से शुरू हो चुकी है. चंद्रयान 2 श्रीहरिकोटा के सतीश धवन सेंटर से लॉन्च होगा. अंतरिक्ष के क्षेत्र में अंतरराष्ट्रीय होड़ उस समय और तेज़ हो जाएगी जब भारत अपने कम-खर्च वाले मिशन को लॉन्च करेगा औऱ दुनिया का चौथा ऐसा देश बन जाएगा, जिन्होंने चंद्रमा पर खोजी यान उतारा है.

तो चलिए आपको बताते हैं कि क्या कुछ खास है इस चंद्रयान 2 में . ‘चंद्रयान 2’ का ऑरबिटर, लैंडर और रोवर लगभग पूरी तरह भारत में ही डिज़ाइन और बनाए गए हैं और वह 2.4 टन वज़न वाले ऑरबिटर को ले जाने के लिए अपने सबसे ताकतवर रॉकेट लॉन्चर – GSLV Mk III – का इस्तेमाल करेगा. इस ऑरबिटर की मिशन लाइफ लगभग एक साल है.

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यान में 1.4 टन का लैंडर ‘विक्रम’ होगा, जो 27-किलोग्राम के रोवर ‘प्रज्ञान’ को चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर दो क्रेटरों के बीच ऊंची सतह पर उतारेगा. ISRO  प्रमुख के. सिवन ने कहा, “विक्रम का 15 मिनट का अंतिम तौर पर उतरना सबसे ज़्यादा डराने वाले पल होंगे, क्योंकि हमने कभी भी इतने जटिल मिशन पर काम नहीं किया है.”

सौर-ऊर्जा से चलने वाला रोवर 500 तक सफर कर सकता है, और उम्मीद है कि वो एक चंद्र दिवस तक काम कर सकेगा, जो पृथ्वी के लगभग 14 दिन के बराबर होते हैं. के. सिवन ने बताया, मिशन के दौरान चांद पर पानी तलाशने के अलावा ‘शुरुआती सौर मंडल के फॉसिल रिकॉर्ड’ तलाश किए जाएंगे.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वर्ष 2022 तक मानव को अंतरिक्ष में भेजने की बात कही है. अधिकतर विशेषज्ञों का कहना है कि इस मिशन से मिलने वाला जियो-स्ट्रैटेजिक का फायदा ज़्यादा नहीं है, लेकिन भारत का कम खर्च वाला यह मॉडल कमर्शियल उपग्रहों और ऑरबिटिंग डील हासिल कर पाएगा.

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लेकिन  कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि जो भी कम खर्च के बारे में सोचते हैं, उन्हें धरती पर उड़ने वाले लो-कॉस्ट एयरलाइनों के विमानों में मिल पाने वाली सुविधाओं को याद रखना होगा. NASA  के पूर्व  रिसर्चर स्कॉट हुब्बार्ड ने भारत के मंगल मिशन की तुलना अमेरिकी मेवन मिशन से की है.

स्कॉट हुब्बार्ड के मुताबिक, दोनों ही 2013 में लॉन्च किए गए, मेवन की लागत 10 गुणा ज़्यादा होने का अनुमान है, लेकिन भारत के मंगलयान को सिर्फ एक साल काम कर पाने के लिए डिज़ाइन किया गया  औऱ अमेरिकी मिशन को दो साल तक काम करना था. कीमत में बहुत ज़्यादा अंतर है. मंगलयान कुल 15 किलो तक वज़न ले जा सकता था, जबकि मेवन ज़्यादा आधुनिक उपकरणों के साथ 65 किलो तक का वज़न ले जाने में सक्षम था.

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इस मिशन से ये भी सामने आएगा कि अपोलो 11 मिशन के ज़रिये नील आर्मस्ट्रॉन्ग द्वारा मानव सभ्यता के लिए उठाए गए अहम कदम के बाद से अंतरिक्ष विज्ञान कितना आगे निकल चुका है. आपको बता दें कि भारत ने 3,84,400 किलोमीटर की यात्रा के लिए ‘चंद्रयान 2’ को तैयार करने में 960 करोड़ रुपये खर्च किए हैं, और यह सतीश धवन स्पेस सेंटर से उड़ान भरके चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर 6 सितंबर को उतरेगा. आपको बता दें कि इससे पहले 22 अक्टूबर 2008 में चंद्रयान 1 लॉन्ज किया गया था.

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