साल 2016, जुलाई का महीना… और तारीख 13. अहमदनगर जिले के कोपर्डी गांव के एक घर से शाम के वक्त एक लड़की बाहर निकली, लेकिन दोबारा वो कभी वापस नहीं लौटी. कहा गया, कि उसी दिन गाँव के ही तीन लड़कों ने उसका कथित तौर पर बलात्कार किया और उसकी हत्या कर दी.पीड़ित लड़की मराठा थी. गिरफ़्तार होने वाले तीनों युवा दलित थे.

पहले से आंदोलन की तैयारी कर रहे मराठाओं के लिए इस कांड ने ट्रिगर का काम किया. माहौल तैयार था. मराठों में गुस्सा था. घटना के बाद मराठा समाज सड़कों पर उतरा आया. पहला मोर्चा औरंगाबाद में हुआ. उस मोर्चे में मराठों ने अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम को ख़त्म करने की मांग की. मराठों का तर्क था, कि दलित इस क़ानून का गलत इस्तेमाल कर रहे हैं. लेकिन बाद में अधिनियम में संशोधन करने की मांग ने ज़ोर पकड़ लिया.
महाराष्ट्र के कई शहरों में मोर्चे निकाले गए. मोर्चों में लाखों लोग शरीक हुए. कहा गया, कि इस आंदोलन का कोई लीडर नहीं है. मोर्चे और जलूस खामोश निकलते थे. दिलचस्प बात ये थी, कि लाखों लोगों के शामिल होने के बावजूद मोर्चे संगठित और अनुशासित होते थे.

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गैंगरेप के खिलाफ सड़कों पर मराठा

‘‘शिवाजी महाराज के बाद आज पहली बार मराठा समाज एक हुआ है”. 2016 में ये शब्द संभाजी राजे के थे। कौन हैं संभाजी राजा? राज्य सभा के सदस्य हैं, मराठा राजा शिवाजी की 13वीं पीढ़ी भी हैं और पूर्व कोल्हापुर रियासत के शाहू महाराज की चौथी पीढ़ी के सदस्य.

मराठा आंदोलन

महाराष्ट्र के बाहर ये सवाल किया जा रहा है, कि मराठा समाज अचानक सड़कों पर क्यों आ गया है? तो आपको बता दें, कि ये अचानक नहीं हुआ है. इस आंदोलन को खड़ा करने का काम पहले से चल रहा था. आरक्षण की मांग 10 सालों चली आ रही है, लेकिन कोपर्डी में हुई इस घटना ने मराठों को एकजुट होने पर मजबूर किया.

न्याय के लिए पहले ये लोग स्थानीय स्तर एकजुट हुए, फिर धीरे-धीरे प्रदर्शनों का दौर बढ़ता गया. कुछ महीनों में इस भीड़ ने शहरों की ओर रुख़ किया, तो देशभर का ध्यान इनपर गया. राजनीतिक पार्टियों को इसमें वोट बैंक नज़र आया, तो वे भी खुद को स्थापित करने की चाह में आंदोलन का समर्थन करने लगे. जुलाई 2016 में रेप की घटना के बाद शुरू हुआ ये आंदोलन सितंबर आते-आते बड़ा हो गया. सितंबर 2016 में औरंगाबाद में मूक आंदोलन का आयोजन किया गया, जिसमें लाखों लोगों के शामिल होने की बात कही गई.

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मुंबई में मराठा आंदोलनकारियों का जुलूस

कोपर्डी की घटना के दोषियों को सज़ा देने की मांग को लेकरक शुरू हुए इस आंदोलन के मांगों की फेहरिस्त भी वक्त के साथ लंबी होती चली गई. गुजरात में पटेलों और हरियाणा में जाटों के आरक्षण की मांग इस दौरान तेज़ थी. मराठों ने भी आरक्षण का मुद्दा उठाया और उसका नतीजा आज देखने को मिल रहा है.

तो फिर रेप के दोषियों का क्या हुआ?

रेप का मामला कोर्ट में गया. सरकारें सजग हुईं. एक साल बाद नवंबर 2017 में रेप के मामले में तीन को अहमदनगर सेशन कोर्ट दोषी माना और जीतेंद्र शिंदे, संतोष कोरख भावल और नितिन गोपीनाथ भाईलुमे को फांसी की सजा सुनाई गई।

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जीतेंद्र शिंदे, संतोष भावल, नितिन भाईलुमे

शुरुआत में इस आंदोलन का कोई अगुआ नहीं था. लेकिन इसके बड़ा होने में सोशल मीडिया का बड़ा हाथ रहा. सोशल मीडिया की वर्चुअल दुनिया में मराठा एकजुट होने लगे और उसका वास्तविक स्वरूप सड़कों पर दिखने लगा. लेकिन पिछले दिनों ये आंदोलन हिंसक हो गया था. मुंबई, नवी मुंबई, ठाणे में आंदोलन हुए, जिसमें पत्थरबाज़ी तक हुई. पुणे के पास चाकन में आंदोलनकारियों ने कई गाड़ियों को आग के हवाले कर दिया. अभी तक आंदोलन में दो जानें भी जा चुकी हैं. मराठा संगठनों ने अगस्त क्रांति यानी नौ अगस्त को मुंबई में विशाल रैली करने का एलान कर दिया है। महाराष्ट्र सरकार ने मराठाओं को आरक्षण देने का आश्वासन दिया है, लेकिन ये लोग एक दिन में अध्यादेश लाकर आरक्षण का एलान करने की मांग पर अड़े हैं।

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