आपने लोगो को गांव, मुहल्ले या कॉलोनियों में बदनाम होते हुए देखा होगा, और इससे भी ज्यादा हो सकता है तो आस पास के दो-चार गांव में वो लोग बदनाम हो. लेकिन वहीं अगर कुछ लोगों की खराब हरकत के चलते पूरा गांव ही देश में बदनाम हो तो कैसै लगेगा. खबर सुनकर आप चौंक गए, चोकिए मत, ये खबर बिलकुल सच है.

दरअसल इस गांव का नाम है पाचोरी, जो मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र सीमा की सतपुड़ा पहाड़ी पर घने जंगल में बसा हुआ है. जहां हथियार बनाने का कारोबार चर्म सीमा और धड़ल्ले से चलता है. जिसके चलते इस गांव की बदनामी पूरे देश में होती है. बता दें कि इस गांव में सिकलीगरों के 60 मकान हैं जिसमें करीब 900 लोगों की आबादी निवास करती है. और ये सिख समुदाय के अंदर आते हैं.

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पाचोरी गांव

यह समुदाय सिखों की तरह परम्परागत रूप से सिर पर पगड़ी बांधने की बजाए जूड़ा बनाना पसंद करता है। दरअसल झोपड़ों से बने इस गांव में देशी पिस्टल और कार्बाइन दबाकर बनाई जाती हैं. यहां स्थिति ये बनी हुई कि यदा-कदा पिस्टल की तस्करी करते हुए सिगलीकरों लोगों को पुलिस आये दिन पकड़ती रहती है।

देशी पिस्टल और कार्बाइन बनाते हुए

साथ ही ये गांव इसलिए भी बदनाम है क्यो कि यहां के कुछ लोग दिल्ली, मुंबई, भोपाल, जबलपुर सहित कई बड़े शहरों में तस्करी में पकड़े गए. यही नहीं बल्कि एक खुलासे में पता चला था कि कन्नड़ पत्रकार गौरी लंकेश हत्याकांड में प्रयोग होने वाली पिस्टल इसी गांव की बनी हुई थी. जिसके बाद ये गांव फिर सुर्खियों में आ गया है।

आखिर ऐसा इस गांव के लोग क्यो करने के लिए मजबूर हैं. बता दें कि साल 2003 में पुलिस-प्रशासन के आला अफसरों की अगुवाई में पूरे गांव ने अवैध हथियार बनाने से इंकार करके आत्मसमर्पण कर दिया था। ऐसा इन गांव के लोगों ने इसलिए किया था. जिसमें अफसरों ने सिकलीगरों को योजनाओं के तहत लोन दिलाकर स्वरोजगार से जोड़कर लोगों को काम से लगाने की बात कही थी। लेकिन ये वादे खोखले साबित हुए.

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पाचोरी के लोग आत्मसर्पण करते हुए

बाद में तीन साल तक भले ही इन लोगों ने हथियार नहीं बनाए लेकिन नौबत ये आ गई कि आखिरकार लोग बेरोजगारी और भुखमरी में आकर त्राही त्राही करने लग गए. और अंत में मजबूरन इन्हें हथियार बनाने वाला धंधा अपनाना ही पड़ गया. और इस मजबूरी तक लोगो को किसी और ने नही पहुंचाया बल्कि उस समय की तत्कालीन सरकार ने किए गए वायदों की नाकामी कारण था.

इसी के कारण आजादी के 70 साल बाद भी यहां विकास कोसों दूर है. गांव में किसी के भी घर में शौचालय तक नहीं हैं तो वहीं पक्के मकान के नाम पर दो चार मकान ही दिखाई देते हैं.  बाकी सभी झोपड़े हैं. और यही नहीं बल्कि पिछले दिनों खकनार में लगे रोजगार मेले के माध्यम से 71 परिवारों ने स्वरोजगार के लिए बैंकों में आवेदन किया था, लेकिन किसी का भी लोन मंजूर नहीं हुआ.

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पाचोरी गांव

तो आखिरकार ये बात भी साफ निकलकर आ गई है कि एक बार जिस जगह पर काले धब्बे लग जाए तो वहां सरकार भी जल्द ही अपना मुंह पीछे फेर लेती है. जब कि संविधान के अनुसार देश के किसी भी नागरिक को सरकार की नीतियों और योजनाओं से दूर नहीं किया जा सकता है.

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