होली के बाद दीपावली और दीपावली के बाद छठ पूजा। हिन्दू धर्म में हर साल ये त्यौहार आते हैं और लोग इन्हें बड़े ही धूम-धाम से मनाते हैं। एक तरफ जहां दीपावली सभी लोग मनाते हैं, वही छठ पूजा खास तौर पर बिहार और पूर्वांचल के लोग मनाते हैं, भले ही इसे पूरा देश ना मनाता हो, लेकिन इस त्यौहार का महत्व दीपावली से भी बड़ा माना जाता है। लेकिन क्या आपको पता है, कि इस त्यौहार को क्यों मनाया जाता है? आखिर कौन सी ऐसी घटना घटी, जिसके बाद से छठ पूजा मनाई जाने लगी और आज भी मनाते हैं।

जरुर पढ़ें:  कुत्ते का साथ घूम रही JNU की जर्मन छात्रा के सामने एक शख्स ने की गंदी बात
Demo Pic-Chhath pooja

कहा जाता है, कि छठ पूजा मनाने के पीछे अंगराज कर्ण है और वर्तमान अंग प्रदेश भगलपुर है, जो बिहार में है। अंग राज कर्ण के विषय में कथा ये है, कि ये पाण्डवों की माता कुंती और सूर्यदेव की संतान थे। कर्ण अपने आराध्य देव सूर्य देव को मानते थे, और वे नियम से कमर तक पानी में जाकर सूर्य देव की अराधना किया करते थे और उस वक्त ज़रुरतमंदों को वरदान भी दिया करते थे। यानी उस समय जो भी उनसे मांगों वो उसे दान में दे दिया करते थे।

Demo Pic-Chhath Pooja

माना जाता है, कि कर्ण कार्तिक शुक्ल षष्ठी और सप्तमी के दिन कर्ण सूर्य देव की विषेश पूजा किया करते थे। अपने राजा की सूर्य भक्ति से प्रभावित होकर अंग देश के निवासी सूर्य देव की पूजा करने लगे थे, फिर धीरे-धीरे सूर्य पूजा का विस्तार पूरे बिहार और पूर्वांचल तक होने लगा। प्राचीन काल में इसे बिहार और उत्तर प्रदेश में ही मनाया जाता था, लेकिन आज इस समाज के लोग जहां भी रहते हैं, वहां इस त्यौहार को बड़ी श्रद्धा के साथ मनाते हैं।

जरुर पढ़ें:  अब सिरदर्द और मुंह के छालों को जड़ से मिटाने में मददगार साबित होंगे 'पीएम मोदी'

ये कारण भी है छठ पूजा मनाने का

छठ के बारे में कर्ण के अलावा एक और पौराणिक कथा है, जिसकी वजह से आज हर बिहारवासी छठ पूजा मनाते हैं। माना जाता है, कि कार्तिक शुक्ल पक्ष की षष्ठी के सूर्यास्त और सप्तमी के सूर्योदय के बीच वेदमाता गायत्री का जन्म हुआ था। प्रकृति के षष्ठ अंश से उत्पन्न षष्ठी माता बालको की रक्षा करने वाले विष्णु भगवान द्वारा रची माया है। बालक के जन्म के छठे दिन छठी मैया की पूजा अर्चना की जाती है, जिससे बच्चों के उग्र ग्रह शांत हो जाएं और जिन्दगी में किसी भी प्रकार कष्ट ना आए, इसलिए इस दिन षष्ठी देवी का व्रत किया जाने लगा।

Loading...