इस्लाम घर्म में हज यात्रा का महत्व बहुत ज्यादा है. हर साल दुनिया भर से लाखों मुस्लिम हज यात्रा के लिए मक्का पहुंचते हैं. इस्लाम धर्म में ऐसा माना जाता है कि हर वह शख्स जो वित्तीय तौर पर मजबूत है उसे अपनी जिंदगी में एक बार जरूर हज की यात्रा करनी चाहिए. लेकिन अब इसी हज यात्रा के विरोध में दुनियाभर के मुस्लमान उतर आएं है. आखिर क्यों मुस्लिम समाज हज यात्रा का बहिष्कार कर रहा है?

फॉरेन पॉलिसी की रिपोर्ट के मुताबिक, अप्रैल महीने में लीबिया के सबसे जाने माने सुन्नी मौलवी ग्रैंड मुफ्ती सादिक अल-घरीआनी ने सभी मुस्लिमों से हज तीर्थयात्रा का बहिष्कार करने की अपील की. उन्होंने ये भी कहा कि अगर कोई भी शख्स दूसरी बार हज तीर्थयात्रा करता है तो यह नेकी का काम नहीं बल्कि पाप होगा. आखिर ऐसा क्यों? दुनियाभर के तमाम मुस्लिम हज यात्रा की तैयारी एक साल पहले ही करना शुरू कर देते हैं फिर अचानक ऐसा क्या हुआ कि अब इस हजयात्रा का विरोध किया जा रहा है?

दरअसल सऊदी अरब प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान पिछले कुछ समय से अपने देश की घरेलू और विदेशी नीतियों पर पर्दा डालने की कोशिश कर रहे हैं. लेकिन इसके बावजूद वह अपने खिलाफ उठ रही आवाजों को दबा नहीं पा रहे हैं. यमन में सऊदी बमों से मरने वालों की बढ़ती तदात,  इस्तांबुल के सऊदी दूतावास में पत्रकार जमाल खशोगी की बेरहमी से की गई हत्या और रियाद के ईरान को लेकर आक्रामक रवैये की वजह से सऊदी के सुन्नी मुसलमान भी प्रिंस को समर्थन देने के अपने फैसले पर दोबारा सोचने को मजबूर हो गए हैं.

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इस बहिष्कार की अपील के पीछे की वजह ये है कि मक्का की तीर्थयात्रा के जरिए सऊदी अरब की अर्थव्यवस्था मजबूत हो रही है. मजबूत अर्थव्यवस्था के जरिए सऊदी की हथियारों की खरीद जारी है जिससे यमन और अप्रत्यक्ष तौर पर सीरिया, लीबिया, ट्यूनीशिया, सूडान और अल्जीरिया में हमलों को अंजाम दिया जा रहा है. मौलवी सादिक ने कहा कि हज में निवेश करना, मुस्लिम साथियों के खिलाफ हिंसा करने में सऊदी की मदद करना होगा.

सिर्फ सादिक ही वो मुस्लिम स्कॉलर नहीं है जो हज पर बैन का समर्थन कर रहे हैं. बल्कि सुन्नी मौलवी और सऊदी अरब के प्रखर आलोचक युसूफ अल-काराडावी ने अगस्त महीने में फतवा जारी किया था जिसमें हज न जाने की अपील की गई थी. इस फतवे में कहा गया था कि भूखे को खाना खिलाना, बीमार का इलाज करवाना और बेघर को शरण देना अल्लाह की नजर में हज पर पैसा बहाने से ज्यादा अच्छा काम है.

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दूसरी तरफ सऊदी अरब सिर्फ राजनीतिक और सैन्य तौर पर ही शक्तिशाली नहीं है बल्कि इस्लाम के साथ इसका ऐतिहासिक रिश्ता भी काफी अहमियत रखता है. इस्लाम के दो सबसे प्रमुख तीर्थस्थल मक्का और मदीना दोनों सऊदी अरब में ही हैं और यहीं काबा और पैगंबर मोहम्मद की मजार भी है. यही वजह है कि सऊदी अरब का असर सिर्फ अरब पड़ोसियों पर ही नहीं बल्कि पूरी मुस्लिम दुनिया पर है. हर साल करीब 23 लाख मुस्लिम हज के लिए मक्का जाते हैं. इस्लाम के साथ इस रिश्ते की वजह से सुन्नी अरब दुनिया लगातार सऊदी अरब से मार्गदर्शन लेती रही है.

ईरान की 1979 की इस्लामिक क्रान्ति और पूरे क्षेत्र में इसके फैल जाने के डर से सऊदी अरब ने खुद को इस्लाम के ब्रैंड के तौर पर पेश करने के लिए दुनिया भर में मस्जिदों की फंडिंग में लाखों डॉलर्स खर्च किए और तब से सऊदी अरब खुद को मुस्लिम दुनिया के नेता के रूप में पेश करता रहा है. हाल ही में एक ब्रिटिश कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि सऊदी अरब के साथ हथियारों के समझौते गैर-कानूनी हो सकते हैं. तो इस पर इस्लामिक स्कॉलर सादिक ने एक कदम आगे बढ़ते हुए कहा कि सऊदी का बहिष्कार करने के लिए हज ना करने जाएं.

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सोशल मीडिया पर भी इसकी लहर देखने को मिल रही है. ट्विटर पर कम से कम 16,000 ट्वीट्स के साथ #boycotthajj ट्रेंड कर रहा है. दुनिया भर के सुन्नी मौलवी भी हज के बहिष्कार की अपील कर रहे हैं. इस्लाम के पांच स्तंभों में से हज को एक प्रमुख स्तंभ माना गया है और यह मुस्लिमों के लिए जरूरी भी है लेकिन बहिष्कार की ये मांग इशारा करती है कि सऊदी के प्रति ये चिंताएं कितनी वास्तविक हैं. अगर यह ट्रेंड जारी रहता है तो यह सऊदी अरब के लिए न सिर्फ इस्लाम के लिहाज से बल्कि उसकी अर्थव्यवस्था के लिए भी बड़ी चुनौती बन सकता है.

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