देश की सरकार हो या हमारा समाज जो बड़े बड़े दावे करते है समानता के, दावे करते है एकता के, क्यों पीछे हट जाते है उस वक्त, जब वक्त आता है उन दावों को हकीकत में बदलने का ? तमाम विरोधी पार्टियां जो इन्ही मुद्दों को उठाकर सत्ता में बैठी पार्टियों के खिलाफ इस्तेमाल करती हैं क्यों वो भूल जाती हैं इन मुद्दों को जब वो खुद सत्ता में पहुंच जाती है ?

देश में ऐसे हजारों लाखों लोग हैं जो काबिल हैं, जज्बे और जुनून से भरपूर हैं लेकिन उनकी शारिरिक कमियों के चलते यही प्रशासन उन्हें आगे बढ़ने से रोक देता है. ये सवाल उन तमाम नेताओं से हैं कि कहां चली उनकी एकता और समानता जब न जाने कितने ही काबिल लोगों को सिर्फ शारिरिक कमियों के चलते आगे बढ़ने नहीं दिया जाता. और उन्हें रोकने वाला भी यही प्रशासन ही होता है.

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गुजरात के भावनगर के रहने वाले गणेश की कहानी भी कुछ ऐसी ही है. बात साल 2018 की है जब उनकी उम्र 17 साल थी, कद 3 फीट और वजन 14 किलो, बच्चों जैसी आवाज और 70 फीसदी विकलांगता. जिस कारण से 2018 में NEET परीक्षा में 233 अंक हासिल करने के बावजूद उन्हें मेडिकल कॉलेज में दाखिला नहीं दिया गया. क्यों, क्योकि वो विक्लांग थे. लेकिन उस प्रशासन से मैं ये सवाल करती हूं कि क्या उन्हें हक नहीं है सपने देखने का और उन्हें पूरा करने का.

लेकिन गणेश ने हार नहीं मानी और उनकी कोशिश जारी रही और आखिरकार अपनी जंग को जीत ही लिया. जी हां अब सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद गणेश भी सरकारी मेडिकल कॉलेज में दाखिला लेकर अपना डॉक्टर बनने का सपना पूरा करने जा रहे हैं.

गणेश अब 18 साल के हो गए हैं और वजन भी 14 से 15 किलो हो गया है. हालांकि हाइट उनकी आज भी 3 फीट ही है. पर सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया है कि हाइट की वजह से किसी को उसका करियर बनाने से नहीं रोका जा सकता.  तो चलिए आपको भी बताते हैं गणेश के संघर्ष की कहानी कैसे सरकार के फैसले के खिलाफ उन्होने जंग लड़ी और अपने डॉक्टर बनने के सपने को नई उड़ान दी.

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बात है साल 2018 यानी पिछले साल की जब गणेश ने NEET की परीक्षा में 233 अंक हासिल किए थे. पर, उन्हें दाखिला नहीं दिया गया था. कारण बताया गया कि छोटे कद और विकलांगता के कारण उन्हें ऑपरेशन सहित बाकी जरूरी कामों में दिक्कत होगी जो किसी डॉक्टर के लिए जरूरी है. हालांकि इस नियम के खिलाफ गणेश हाई कोर्ट भी गए. लेकिन हाई कोर्ट ने भी सरकार के फैसले को चुनौती देने वाली उनकी याचिका खारिज कर दी. लेकिन गणेश की हार नहीं मानी, इसके बाद उन्होने हाई कोर्ट के फैसले को चुनौती देने के लिए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया, और आखिरकार सुप्रीम कोर्ट ने उनकी उनकी उड़ान को नए पंख दे दिए. और साफ कर दिया कि किसी की शारिरिक कमी के चलते उसको आगे बढ़ने से नहीं रोका जा सकता.  इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने तीन और दाखिलों को भी मंजूरी दे दी जिन्हें गणेश की तरह ही छोटे कद के चलते रोका गया था.

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गणेश की ये जीत केवल एक व्यक्ती की जीत नही है. बल्कि उन तमाम लोगों की जीत है जिन्हें शारीरिक कमियों के चलते आगे बढ़ने से रोक दिया जाता है. और उन लोगों के मुंह पर तमाचा है जो किसी की काबिलियत को नजर अंदाज करके सिर्फ उसके छोटे कद और विक्लांगता के कारण उसे आगे बढ़ने से रोकते हैं.

 

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