अगर आप एक लड़की है तो आपने जरुर इस बात पर गौर किया होगा कि, आप ट्रैवलिंग के दौरान अपनी सीट पर हमेशा पैर सिकुडकर ही बैठती होंगी। वहीं आपके बगल में कोई लड़का बैठा हो, तो वो हमेशा अपने पैरों को फैलाकर ही बैठता है। एक तरफ तो, लड़के कहे या मर्द जो बड़े चौड़े होकर सीट पर पैर फैलाकर बैठते हैं और सीट पर स्पेस भी ज़्यादा लेते हैं। वही दूसरी तरफ लड़कियां हमेशा शांति से थोडी जगह में ही एडजस्ट करके बैठ जाती हैं। इसके लिए दो साल पहले ही ऑक्सफार्ड डिक्शनरी में मैनस्प्रेडिंग वर्ड जोड़ा गया था। लेकिन सोचने वाली बात ये है, कि मैनस्प्रेडिंग पर कोई सवाल क्यों नहीं उठाता।  सीट पर लड़के ही पैर क्यों फैलाकर बैठते है?

भारत में आज भी इस मैनस्प्रेडिंग को हर लड़की अपने ट्रेवलिंग के टाइम झेलती ही है चाहे बात, ऑटो की हो, बस की या फिर मेट्रो की। यह हर जगह ही देखा जाता हैं। लेकिन, विदेशों में मैन्सप्रेडिंग के लिए साल 2014 में कई अभियान चलाए गए थे। न्यूयॉर्क की मेट्रोपोलिटन ट्रांसपोर्ट अथॉरिटी ने ट्रेवल के टाईम पैर फैलाकर बैठने वाले पुरुष यात्रियों के खिलाफ अभियान चलाया गया था। जिसके लिए शहर की मेट्रों में जगह-जगह साइनबोर्ड लगाए गए थे।

“डूड…कृपया पैर फैलाकर न बैठें.”

इसके अलावा फिलाडेल्फिया ने भी “डूड, इट्स रूड” नामक अभियान चलाया था। और अब ये अभियान एक बार स्पेन में भी चलाया जा रहा हैं। स्पेन की राजधानी मैड्रिड में ट्रांसपोर्ट डिपार्टमेंट ने उन पुरुष यात्रियों के ख़िलाफ खास अभियान चलाया हैं जो सीट पर पैर फैलाकर बैठते हैं। बस का संचालन करने वाली ईएमटी नए संकेत लगा रही हैं, जिसमें पुरुषों को सीट पर पैर फैलाकर बैठने से मना किया गया है। इसी तरह अब ये अभियान मेट्रो में भी चलाया जा रहा है। जहां पुरुष पैर फैलाकर ना बैठे, लेकिन ऐसा नहीं है कि, ये पहली बार अभियान चलाया गया दुनियाभर में पहले भी ऐसे चार अभियान चलाए गए हैं। लेकिन देखना ये होगा की इस तरह के अभियान कभी भारत में चलाए जाएगें की नहीं? और चलाए भी जाएगें तो कब ?
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