राफेल के मुद्दे पर शुरू हुए और ईवीएम की बदनामी पर खत्म हुए चुनाव में सारा विपक्ष औंधे मुंह गिर पड़ा है. ईवीएम और चुनाव आयोग के नाम फातिया पढ़ने वाले विपक्षी ऐसे शांत हो गए हैं, कि कहने के लिए मानो उनके पास अभी कुछ भी नहीं है मोदी की आंधी में विपक्षी ऐसे उड़े कि उनका कद और ओहदा दोनों ही बेअसर हो गए दो सीटों से शुरू हुआ बीजेपी की सफर दोबारा तक पहुंचा तो वो भी ऐतिहासिक है. बीजेपी ने ट्रिपल सेंचुरी लगाकर राजनीतिक पंडितों के अनुमानों को आंधी में उड़ने वाले चिथड़ों की तरह तार-तार कर दिया है और उन दिग्गजों को भी जो कभी सूबे के सिरमौर हुआ करते थे ।

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जीहां इस चुनाव में मोदी की आंधी कांग्रेसी खेमे से कभी मुख्यमंत्री रहे नौ कद्दावर नेताओं को मुंह की खानी पड़ी.
हरियाणा के पूर्व सीएम भूपेंद्र हुड्डा जिनकी गिनती कांग्रेस के दिग्गजों में होती है. वो 4 बार सासंद, 2 बार सूबे की सीएम रहे. लेकिन सोनीपत में अपनी साख बचाने में नाकाम रहे और मोदी की सुनामी में बीजेपी उम्मीदवार रमेश कौशिक बाज़ी मार गए. वो भी थोड़े-मोड़े वोटों से नहीं, कुल 164864 वोटों से हुड्डा को हार का सामना करना पड़ा ।

उत्तराखंड के पूर्व सीएम हरीश रावत का नाम भी इसी फेहरिस्त में शामिल हो गया है. बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष अजय भट्ट ने उनको 3,39,096 वोटों से परास्त कर कही का नहीं छोड़ा ।

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महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री और महाराष्ट्र कांग्रेस के अध्यक्ष अशोक चौहान नांदेड से इस बार अपनी सीट नहीं बचा पाए… दिल्ली में 15 साल तक सीएम रही शीला दीक्षित का जलवा भी मनोज तिवारी के आगे फीका रहा और वे साढ़े तीन लाख से भी ज्यादा वोटों से हार गई ।

मध्यप्रदेश में 10 साल तक सूबे की सीएम रहे दिग्विजय सिंह भी प्रज्ञा ठाकुर के खिलाफ बुरी तरह हारे यहां से प्रज्ञा ने उन्हें तीन लाख 60 हज़ार से ज्यादा मतो से पटखनी दी.  देश के पूर्व गृहमंत्री और महाराष्ट्र के पूर्व सीएम सुशील कुमार शिंदे तो अपनी पारंपरिक सीट सोलापुर को भी नहीं बचा पाए शिंदे को बीजेपी के जय सिद्धेश्वर शिवारचरी ने 1,58,608 वोटों से हरा दिया ।

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वहीं अरुणाचल से सीएम रहे नबाम तुकी को भी मोदी सुनामी में हार का सामना करना पड़ा. 8 साल तक मेघालय के सीएम रहे मुकुल संगमा और कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री वीरप्पा मोइली भी अपनी सीट नहीं बचा सके…

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