हैवानियत की सारी हदें पार करने वाला कठुआ कांड. जिसमें एक 8 साल की मासूम ने वो दर्द झेला जिसकी कल्पना भी करना नामुमकिन. पूरा देश उस मासूम के साथ हुई दरिंदगी की खबर सुनकर दहल उठा था. हर किसी की जुबान पर केवल एक ही बात थी, और वो थी उन दरिंदों से इस हैवानियत का बदला. उस घटना को 17 महीने बीत चुके हैं लेकिन आज भी जब उस मासूम बच्ची के साथ हुई दरिंदगी का जिक्र भी होता है तो मानों रौंगटे खड़े हो जाते हैं.

उस घटना में बच्ची ने अपना जान गवां दी. जिसे अब वापस तो नहीं लाया जा सकता लेकिन अब 17 महीनों बाद उसके गुन्हेगारों को उनके किए की सजा मिल गई हैं. जम्मू-कश्मीर के कठुआ गैंगरेप और मर्डर केस में 8 साल की मासूम को इंसाफ मिल गया है. दरअसल पठानकोट सेशन कोर्ट ने 7 में से 6 आरोपियों को दोषी करार देने के बाद सोमवार को सजा का ऐलान कर दिया. मामले के मुख्य साजिशकर्ता सांजी राम, परवेश कुमार और पुलिस अधिकारी दीपक खजुरिया को उम्रकैद की सजा सुनाई गई है. वहीं पुलिस ऑफिसर सुरेंदर शर्मा, हेड कॉन्स्टेबल तिलक राज और एसआई आनंद दत्ता को पांच-पांच साल की कैद की सजा दी गई है.

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लेकिन आज कि हमारी इस खबर में हम आपके लिए एक बड़ी और खास जानकारी लेकर आए हैं. अब जैसा कि आप जानते ही होंगे कि भारत में अगर कोई अपराध होता है तो उसके लिए भारतीय दंड संहिता के तचत सजा सुनाई जाती है. जिसे अंग्रेजी में INDIAN PENAL CODE कहते हैं. आमतौर पर इसको IPC कहा जाता है. लेकिन देश के एक हिस्सा ऐसा भी है जहां IPC काम नहीं करता. और वो है जम्मू कश्मीर. क्योंकि जम्मू कश्मीर में अपराध होने पर अलग से कानून है.  जिसके तहत अपराधियों को सजा सुनाई जाती है. जिसे RPC कहते हैं यानी कि RANBIR PENAL CODE. भारतीय संविधान की धारा 370 के मुताबिक जम्मू कश्मीर राज्य में आईपीसी का इस्तेमाल नहीं किया जा सकता. यहां सिर्फ रणबीर दंड संहिता का इस्तेमाल होता है.

आपको बता दें कि कठुआ का मामला पठानकोट की अदालत में था. लेकिन अपराध जम्मू-कश्मीर में हुआ था. इसलिए इस मामले में भी सुनवाई आरपीसी के तहत हुई है. आरपीसी और सीआरपीसी में भले ही कुछ अंतर है, लेकिन रेप और हत्या जैसे मामलों में आरपीसी और सीआरपीसी की धाराएं लगभग एक सी हैं. आईपीसी में भी हत्या और रेप के लिए उम्रकैद से लेकर फांसी तक का प्रावधान है और आरपीसी में भी उम्रकैद से लेकर फांसी तक का प्रावधान है.

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अब यहां आप सोच रहे होंगे कि RPC है क्या और इसमें IPC से क्या अलग है तो चलिए हम आपको बताते हैं दोनों के बीच अंतर.. लेकिन उससे पहले जान लीजिए कि क्या है ये RPC..

दरअसल देश की आजादी से पहले जम्मू-कश्मीर एक स्वतंत्र रियासत थी. उस वक्त जम्मू-कश्मीर में डोगरा वंश का शासन था और महाराजा रणबीर सिंह वहां के शासक थे. उन्हीं के नाम पर 1932 में रणबीर दंड संहिता बनाई गई थी. इस रणबीर संहिता को भी भारत के लिए कानून बनाने वाले थॉमस बबिंगटन मैकाले के बनाए कानून के आधार पर ही बनाया गया था.

आपको बता दें कि आईपीसी और आरपीसी में समानताएं ज्यादा हैं और अंतर कम. दोनों कानूनों में क्या अंतर हैं, वो हम आपको बताते हैं.

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-अगर कोई अपराध कम्प्यूटर से जुड़ा हो तो आईपीसी में इसका जिक्र है, लेकिन आरपीसी में इसका जिक्र नहीं है.

 -अगर कोई किसी सभा में या फिर किसी सार्वजनिक जगह पर खतरनाक हथियार लेकर जाता है, तो आईपीसी की धारा 153 CAA के तहत उसे दंड दिया जाता है, लेकिन आरपीसी में इसका जिक्र नहीं किया गया है.

– अगर किसी को कोर्ट में जबरन झूठी गवाही या बयान देने के लिए दवाब डाला जाता है, तो आईपी में इसके लिए धारा है 195 A. लेकिन आरपीसी में इसके लिए कोई धारा नहीं है.

-आईपीसी में दहेज हत्या को लेकर कई धाराएं हैं, लेकिन रणबीर दंड संहिता में दहेज हत्या को लेकर कानून नहीं है.

– रणबीर दंड संहिता की धारा 190 के तहत सरकार ऐसे किसी भी आदमी को सज़ा दे सकती है, जो सरकार की ओर से अमान्य या जब्त की गई सामग्री का प्रकाशन या वितरण करता है. इस मामले में अपराध का फैसला राज्य का मुख्यमंत्री करता है.

-विदेशी ज़मीन पर या समुद्री यात्रा के दौरान जहाज़ पर किए गए अपराध के लिए आरपीसी में कोई धारा नहीं है.

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