फ्रांसीसी सेनानायक नेपोलियन बोनापार्ट एक बार दुनिया का नक्शा देख रहा था, तभी उसकी नजर चीन के नक्शे पर एकाएक टिक गई। नेपोलियन के मुंह से निकला ओह! ये सोया हुआ दैत्य है, इसे सोने दो। इस वाकये को दो शताब्दियां बीत चुकी हैं। पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना नाम का ये ड्रैगन अब न सिर्फ जाग चुका है, बल्कि फुफकार भी मारने लगा है।भारत,भूटान जैसे कई देश इसकी फुफकार से त्रस्त हैं, लेकिन ये ड्रैगन हमेशा से इतना शक्तिशाली नहीं था। बल्कि बचपन में इस चीनी ड्रैगन को इसके हिंदी भाई ने ही ऐसा ‘ब्रह्मास्त्र’ थमा दिया, जिससे इस ड्रैगन की चौधराहट चल पड़ी।

साल 1950 तक चीन के बड़े हिस्से पर लाल सेना का कब्जा हो चुका था। माओ की अगुवाई में लाल सेना बड़ी रफ्तार से चीन की मुख्य भूमि पर फैल रही थी। कोऊ-मिन-तांग सरकार की आखिरी ईंट भी ढह चुकी थी। रिपब्लिक ऑफ चाइना का शासक च्यांग काई शेक चीन की मुख्य भूमि छोड़कर ताइवान (तब फार्मोसा द्वीप) भाग चुका था। रिपब्लिक ऑफ चाइना अब पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना बन चुका था। इधर चीन में क्रांति, उधर दुनिया की दो महाशक्तियों के बीच शीत युद्ध भी परवान चढ़ रहा था। लेकिन इस घटनाक्रम के बीच सुरक्षा परिषद का स्थायी सदस्य अब भी रिपब्लिक ऑफ चाइना ही था, न कि पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना। यानि कोउ-मिन-तांग की अगुवाई में फिलहाल ताइवान ही सुरक्षा परिषद का स्थायी सदस्य था, लेकिन इस बीच अब पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना ने सुरक्षा परिषद में अपनी दावेदारी पेश की। उधर पूंजीवाद और साम्यवाद की लड़ाई में पूंजीवादी खेमे की अगुवाई कर रहा अमेरिका किसी भी कीमत में जनवादी चीन यानी आज के पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना को स्थायी सदस्य बनने  से रोकना चाहता था।

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अमेरिकी राष्ट्रपति ड्वाइट डेविड आइज़नहावर के साथ पंडित नेहरू

तब अमेरिका पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना को सुरक्षा परिषद का सदस्य बनाने के पक्ष में नहीं था। इस बीच तब के अमेरिकी राष्ट्रपति ड्वाइट डेविड आइज़नहावर की सरकार ने चीन की जगह भारत को ये पेशकश की, लेकिन तब के ‘भारत भाग्य विधाता’ (तत्कालीन पीएम, जवाहरलाल नेहरू) ने अमेरिकी प्रस्ताव ठुकरा दिया। माना जाता है पचास के दशक में भारत के पास दो बार ऐसे मौके आए, लेकिन भारत ने न सिर्फ उसे ठुकराया बल्कि अपनी सदस्यता के बदले चीन की सदस्यता की जोरदार वकालत की। जीहां उसी चीन को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का स्थायी सदस्य बनाने के लिए भारत ने 25 साल तक मुहीम चलाई, जो चीन आज एनएसजी (न्यूक्लियर सप्लायर ग्रुप) जैसे समुह में भारत की एंट्री का विरोध कर रहा है। वही चीन जो जैश-ए-मोहम्मद के सरगना मसूद अजहर को संयुक्त राष्ट्र से आतंकवादी घोषित कराने की भारत सरकार की कोशिशों में अड़ंगा लगाता है।

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हालांकि इस कहानी के और भी कई पहलु हैं। कुछ लोगों का कहना है, कि इस मसले पर रूस भी भारत की मदद को तैयार था। लेकिन सच्चाई ये है, कि सोवियत संघ इस मामले में दोहरी चाल चल रहा था। एक तरफ सोवियत संघ ने सुरक्षा परिषद में बतौर छठे देश भारत की दावेदारी को अप्रत्यक्ष रूप से समर्थन की बात कही, वहीं दूसरी तरफ तत्कालिन सोवियत संघ (आज रूस) के प्रधानमंत्री मार्शल निकोलाई बुल्गानिन ने 1955 में कहा था, कि सुरक्षा परिषद में भारत की जगह चीन की सदस्यता पर पहले विचार करना चाहिए। वहीं कई लोग तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री की ओर से सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता के अमेरिकी प्रस्ताव को ठुकराने को अफवाह बताते हैं, लेकिन इसे सच मानने के कई प्रमाण भी मौजूद हैं। संयुक्त राष्ट्र में पूर्व अवर महासचिव और अब कांग्रेस सांसद शशि थरुर ने भी कहा है, कि 1953 के आसपास प्रधानमंत्री पंडित नेहरू ने सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता लेने से इनकार कर दिया था। इस सच्चाई पर मुहर लगाता एक और प्रमाण नेहरू म्युजियम में रखी विजयलक्ष्मी पंडित की फाइल नंबर 59 और 60 हैं। इन फाइलों में नेहरु के 1945-50 में यूएन को लिखे खतों को शामिल किया गया, जिसमें इस ऑफर का जिक्र किया गया है।

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बहरहाल शांति दूत भारत की ऐतिहासिक भूल के कारण 1971 में चीन को ताइवान की जगह सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता मिल गई और दानवीर कर्ण का देश भारत अब सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता के लिए दुनिया के चक्कर काट-काट कर एड़ियां घिस रहा है, लेकिन एहसान फरामोश ड्रैगन भारत की हर एक कवायद पर पानी फेरने में कोई कसर नहीं छोड़ता।