पहले कांग्रेस फिर सेंसर बोर्ड और फिर अदालत से लंबी लड़ाई और विवाद के बाद आखिरकार मधुर भंडारकर की फिल्म ‘इंदू सरकार’ को रिलीज के लिए हरी झंडी मिल ही गई। इधर अदालत ने इसके रिलीज़ पर रोक लगाने से इनकार किया और उधर सेंसर बोर्ड ने भी 12 कट के साथ इस फिल्म को मंजूरी दे दी। लेकिन आप सोच रहे होंगे इस फिल्म में ऐसा है क्या? जिसे लेकर कांग्रेस पार्टी इतनी आग बबूला हो रही है, कि वो इस मुद्दे को लेकर अदालत तक चली गई। बताएंगे आगे लेकिन उससे पहले इतिहास की धूल तले दबी उन फिल्मों की बात, जिन्हें सियासी समझ और साजिश की वजह से इसी तरह से दर्शकों से दूर रखने की कोशिश की गई।

फिल्म ‘इंदू सरकार’ का पोस्टर

बॉलीवुड के एक सदी के सफर में कई ऐसी फिल्में आई जो ना सिर्फ विवादों में घिरीं बल्कि उनपर सेंसर की कैंची भी खूब चली। आरोप पॉलिटिकल पार्टियों पर खूब लगते हैं, लेकिन जमाना जब अंग्रेजों का था तब भी फिल्मों पर विवादों और सेंसरशिप का साया मंडराता रहता था। इमरजेंसी के दौर की आंधी से आज की इंदु सरकार तक के सफर पर बात करेंगे, लेकिन पहले उस दौर में चलते हैं जब न तो संविधान था और न ही सरकार। बस देश की सियासत का एक ही रंग था जिसकी कमान फिरंगियों के हाथ में थी।

1943 में आई फिल्म ‘किस्मत’ को पोस्टर

बात आजादी से चार साल पहले यानी 1943 की। बॉम्बे टाकीज की फिल्म ‘किस्मत’ रिलीज़ हुई। फिल्म ने सफलता के तमाम झंडे गाड़े। इस फिल्म का एक गाना ‘दूर हटो ऐ दुनिया वालो हिंदुस्तान हमारा है’ खूब हिट हुआ। लेकिन फिल्म के डायरेक्टर ज्ञान मुखर्जी ने अंग्रेजी हुकूमत के डंडे से फिल्म को बचाने के लिए इस गाने में एक लाइन जोड़ी ‘तुम न किसी के आगे झुकना, जर्मन हो जापानी’। डायरेक्टर अपने शुरुआती कोशिश में कामयाब हुए और फिल्म रिलीज़ हो गई। बाद में अंग्रेजों को अपनी भूल का एहसास हुआ और फिल्म बैन करने की कोशिश की गई। इस गाने को लिखने वाले मशहूर कवि पंडित प्रदीप के खिलाफ गिरफ्तारी वारंट भी जारी किया गया। लेकिन गिरफ्तारी से पहले ही पंडित प्रदीप अंडरग्राउंड हो गए। ये वही प्रदीप थे जिन्होंने मशहूर गीत ‘ऐ मेरे वतन के लोगों’ लिखा है।

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लाल बहादुर शास्त्री के साथ कवि प्रदीप

बहरहाल 15 अगस्त 1947 को देश आजाद हो गया। अब जनता का जनता के द्वारा जनता के लिए चुनी हुई सरकार भी थी, अभिव्यक्ति की आजादी देने वाला संविधान भी था। भारतीय सिनेमा उद्योग के जेहन से अभी भी आजादी का भूत उतरा नहीं था। अब फिल्म इंडस्ट्री सामाजिक सरोकारों के साथ-साथ सियासी मुद्दों को भी सैल्यूलाइड (फिल्मी पर्दे) पर उतारा जाने लगा। लेकिन इस बीच आपातकाल का दौर आया, समाज का दर्पण भारतीय सिनेमा अब सियासत का दर्पण बनने की राह पर चल पड़ा। इस दौरान तत्कालीन सिसायत की परतों को खोलने वाली दो फिल्में आई। पहली फिल्म थी गुलजार की ‘आंधी’ और दूसरी फिल्म थी सांसद और फिल्मकार अमृत नाहटा की ‘किस्सा कुर्सी का’। बात पहले आंधी की।

गुलज़ार की फिल्म ‘आंधी’ पर भी हुआ विवाद

1975 में गुलजार के निर्देशन में बनी फिल्म ‘आंधी’ के रिलीज को लेकर विवादों की ऐसी आंधी उड़ी की तत्कालीन सरकार के निर्देश पर फिल्म के प्रदर्शन पर रोक लगा दी गई। माना गया, कि फिल्म की नायिका आरती देवी (सुचित्रा सेन) का न सिर्फ गेटअप तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी की तरह है, बल्कि फिल्म के कई दृश्य श्रीमती गांधी की नकारात्मक तस्वीर पेश करते हैं। हांलाकि विवाद बढ़ता देख फिल्म में एक संवाद जोड़ा गया, जिसमें फिल्म की नायिका सुचित्रा सेन एक सीन में अपने पिता (रहमान) से कहती हैं, कि इंदिरा गांधी उनकी आदर्श हैं और वो उन्हीं की तरह देश की सेवा करना चाहती हैं। 1977 में देश में आम चुनाव हुए और मोरारजी देसाई की सरकार बनने के बाद फिल्म ‘आंधी’ का राष्ट्रीय टेलीविजन पर प्रीमियर हुआ।

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विवादित फिल्म ‘किस्सा कुर्सी का’

1975 में ही अमृत नाहटा ने ‘किस्सा कुर्सी का’ नाम से फिल्म बनाई। उसी साल फिल्म को सर्टिफिकेशन के लिए भेजा गया। लेकिन सेंसर बोर्ड में मामला अटक गया। इस फिल्म में सत्ता की ताकत और उसके दुरुपयोग को दिखाया गया था। कुछ लोगों का ये भी मानना था, कि ये फिल्म संजय गांधी के इमरजेंसी वाले करेक्टर से काफी मेल खाती थी। बहरहाल जब फिल्म को सेंसर बोर्ड की हरी झंडी नहीं मिली तो मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया। सुप्रीम कोर्ट ने अपनी निगरानी में फिल्म को दिखाने का निर्देश दिया। एक तारीख निकल गई, दूसरी तारीख निकल गई फिर जनवरी 1976 की तीसरी डेडलाइन भी निकल गई लेकिन सुप्रीम कोर्ट को फिल्म नहीं दिखाई गई।

इसी पुस्तक में है उस घटना का जिक्र

बाद में पता चला कि फिल्म के रील गायब है। सीबीआई के एक पूर्व अधिकारी निर्मल कुमार सिंह ने अपनी किताब अपराध और भ्रष्टाचार की राजनीति में इसका जिक्र किया है। उनके मुताबिक मुंबई (तब बंबई) से चलने वाली पश्चिम एक्सप्रेस से फिल्म के रील सहित जरुरी सामग्री 13 पेटियों में दिल्ली पहुंची। इन पेटियों को बाद में गुड़गांव स्थित फैक्ट्री में रखवा दिया गया। माना जाता है बाद में फिल्म के प्रिंट को जला दिया गया। 1977 में आपातकाल हटा अमृत नाहटा कांग्रेस का दामन छोड़ जनता पार्टी के टिकट से राजस्थान के पाली सीट से संसद पहुंचे और उन्होंने दोबारा ‘किस्सा कुर्सी का’ पार्ट-2 बनाई। कई कट्स के साथ ये फिल्म 1978 में रिलीज हुई। मजे की बात ये है, कि अब उन्हीं अमृत नाहटा के बेटे राकेश नाहटा ने ‘किस्सा कुर्सी का’ पार्ट-3 बनाने की बात कही है। राकेश नाहटा ने प्रधानमंत्री मोदी को खत लिखकर ‘किस्सा कुर्सी का’ फिल्म की मूल निगेटिव्स लौटाए जाने की भी गुहार लगाई है। इसके बाद बॉलीवुड में ऐसी दर्जनों फिल्में बनी जो विवादों में रही और सेंसर बोर्ड के निशाने पर भी।

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इंदिरा और संजय गांधी के गेटअप में ‘इंदू सरकार’ के पात्र

अब बात ‘इंदू सरकार’ की 28 जुलाई को रिलीज हो रही इस फिल्म का प्रोमो देखकर ही आपको पता चल जाएगा, कि ये फिल्म किस पर आधारित है। फिल्म के किरदारों में इंदिरा गांधी, संजय गांधी और जगदीश टाइटलर जैसे नेताओं की मेकअप कर हूबहू छवि तैयार की गई है। बताया जा रहा है, कि ये फिल्म 1975 से 77 के दौरान लगाए गए आपातकाल और उस समय हुए दमन की कहानी है। कांग्रेस का आरोप है, कि इस फिल्म में तथ्यों को तोड़ मरोड़कर पेश किया हो सकता है, इसलिए इसे रिलीज ना किया जाए। लेकिन लंबे विवादों के बाद एक डिस्क्लेमर के साथ ये फिल्म अब रिलीज़ होने को तैयार है। इस डिसक्लेमर में लिखा गया है-

‘फिल्म के लिए घटनाओं को नाटकीय रुप दिया गया है और इसका सत्तर फीसदी हिस्सा काल्पनिक है’।

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