मौसम चुनावी है, इसीलिए चुनावी किस्से में बात प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की. उसी नरेंद्र मोदी की, जिनकी एक रैली और मुलाकात के लिए आज देश के हर राज्य के पार्टी के नेता तरसते हैं. लेकिन एक वक्त ऐसा था, जब इसी नरेंद्र मोदी का बीजेपी के कुछ नेताओं ने अघोषित बॉयकाट कर दिया था. तब क्या हुआ था? मोदी और पार्टी पर इसका क्या असर पड़ा था? बताएंगे.

किस्सा 1998 का है. तब मध्यप्रदेश नें कांग्रेस की सरकार थी और दिग्विजय सिंह राज्य के मुख्यमंत्री थे. पांच साल तक कांग्रेस के कुशासन से जनता में काफी रोष था. दिग्विजय सिंह की नीतियों की वजह से जनता परेशान थी. बीजेपी को लग रहा था, कि इस बार सत्ता में वापसी पक्की है. तब पार्टी की कमान पार्टी के पितृपुरुष कहे जाने वाले कुषाभाऊ ठाकरे के हाथ में थी. ठाकरे मध्यप्रदेश के चुनाव में विशेष रुचि ले रहे थे. क्योंकि ये उनके गृहराज्य का मामला था. यहां उनके विश्वस्त और खासमखास थे कृष्णमुरारी मोघे. एक तरह से चुनाव में टिकट बांटने की अघोषित जिम्मेदारी उनके पास ही थी.

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सुंदरलाल पटवा, पूर्व सीएम मप्र

इस चुनाव के लिए कुषाभाऊ ठाकरे ने राज्य चुनाव प्रभारी के तौर पर गुजरात से नरेंद्र मोदी को भेजा था. उसी नरेंद्र मोदी को जिनके बारे में कहा जाता था, कि वे जहां भी जाते हैं, पार्टी को चुनाव जीताकर ही आते हैं. मध्यप्रदेश से पहले उनके पास हिमाचल के चुनाव की जिम्मेदारी थी, और वे वहां से पार्टी को चुनाव जिताकर लौटे थे. नरेंद्र मोदी के मध्यप्रदेश में आने का एलान क्या हुआ, छोटे कार्यकर्ताओं में खुशी की लहर दौड़ पड़ी लेकिन प्रदेश के बड़े नेता इस फैसले नाराज़ हो गए. प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री सुंदरलाल पटवा और कृष्णमुरारी मोघे ने तो खुलेआम इसकी शिकायत पार्टी के आलाकमान से कर दी.

नरेंद्र मोदी, फाइल फोटो

सुंदरलाल पटवा ने तो कुशाभाऊ ठाकरे से कहा, कि ‘जब हम ये राज्य जीत रहे हैं, तो जीत का सेहरा आप मोदी के सर पर क्यों बांधना चाहते हैं. एक बाहरी नेता आकर यहां क्या कर लेगा?’ हालांकि कुषाभाऊ ने अपने फैसले को पलटा नहीं और मोदी राज्य के प्रभारी बने रहे. लेकिन इस दौरान मोदी समझ चुके थे, कि उनके लिए ये चुनाव आसान नहीं है. राज्य के इस चुनाव में मोदी को नेताओं के अघोषित बॉयकाट का सामना करना पड़ा. हालांकि मोदी के अपने तेवार थे. उस दौर में भी वे पूरे लाव-लश्कर के साथ चलते थे. पांच छह लड़के हमेशा उनके साथ रहते थे, जो उनकी सुख सुविधाओं का ध्यान रखते थे.

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राज्य के नेताओं को मोदी की एक बात ये भी पसंद नहीं आती थी, कि जब भी मीटिंग होती, मोदी अपना भाषण देते और खत्म होते ही बैठक से उठकर चले जाते. वे किसी को भी सुनते नहीं थे. हांलिक मोदी ने इस चुनाव में कई नई चीजें की. नए-नए प्रयोग किए. इस चुनाव में घर-घर जाकर बीजेपी के स्टीकर लगाने का आइडिया मोदी का ही थी. ये स्वागत द्वार गुजरात से मंगवाए गए थे. ऐसा मध्य प्रदेश में पहली बार हुआ था. ये वो दौर था जब आदिवासी इलाकों में कांग्रेस की पैठ थी और बीजेपी कहीं नहीं थी. इस अंतर को पाटने के लिए मोदी ने एक नया तरीका निकाला था. मोदी ने गुजरात से कमल के फूल की डिजाइन वाली बिंदियां बड़े पैमाने पर मंगवाई थी और सुदूर आदिवासी इलाकों में बंटवाई थी. उस दौरान हर महिला के माथे पर कमल का फूल ही नजर आता था.

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ज़मीन पर महौल ऐसा था कांग्रेस की विदाई तय है, लेकिन नरेंद्र मोदी और स्थानीय नेताओं की इस अनबन का नतीजा बेहद खराब आने वाला था. चूंकि टिकट बांटने की जिम्मेदारी कुषाभाऊ के खासमखास कृष्णमुरारी मोघे पर थी, उन्होंने कुछ ऐसे लोगों को भी टिकट बांट दिए, जो चुनाव जीतने के लिए लायक भी नहीं थे. और नतीजा ये रहा कि पार्टी इस चुनाव में हार गई. दिग्विजय सिंह की फिर सत्ता में वापसी हुई और मोदी के साथ एक नाकामी भी जुड़ गई, कि वे प्रभारी रहते चुनाव नहीं जिता पाए. हालांकि कांग्रेस को इस चुनाव में 42 फीसद वोट मिले थे और बीजेपी को 41.5 प्रतिशत. आधे फीसद वोट से दिग्विजय सिंह फिर से राज्य के मुख्यमंत्री बन गए.

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