1962 के भारत चीन युद्ध के बारे में आपने अब तक खूब पढ़ा और सुना होगा, लेकिन 11 अप्रैल 1955 को एक ऐसी साजिश नाकाम हुई, जो अगर कामयाब हो जाती तो एशिया के दो बड़े देश चीन और भारत के बीच महायुद्ध तय था।

सीमा पर छिटपुट घटनाओं के बावजूद भारत-चीन संबंधों में गर्मजोशी दिख रही थी। चीनी प्रधानमंत्री चाऊ एन लाई भारत आए। भारतीय प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने भी चीन का दौरा किया। दोनों देशों की सरहदें हिंदी-चीनी भाई-भाई के शोर से सराबोर थी। 11 अप्रैल 1955 की तारीख से ठीक एक साल पहले ऐतिहासिक पंचशील समझौते पर भी दस्तखत हो चुके थे। लेकिन एशिया के दो बड़े देशों की ये करीबी पश्चिमी ताकतों के आंखों की किरकिरी बनती जा रही थी।

पश्चिमी ताकतें मौके की तलाश में थी, कि कैसे भारत-चीन दोस्ती में दरार डाली जाए। मौका था इंडोनेशिया के बांडुंग शहर में होने वाले एशियाई-अफ्रीकी सम्मेलन का। सम्मेलन में एशिया और अफ्रीका के कई देशों के प्रतिनिधि शिरकत करने वाले थे। एक तरफ सम्मेलन की तैयारियां जोरो पर थी, तो दूसरी तरफ पश्चिमी ताकतें अपने साजिश को अंतिम रूप देने में जुटी थीं। इस बीच दिल्ली स्थित अमेरिकी दूतावास में तैनात एक अमेरिकी CIA एजेंट ने वांग फेंग नाम के एक शख्स से मुलाकात की। वांग फेंग ताइवान की कोमिंगतांग यानी केएमटी पार्टी का सदस्य था। इस मुलाकात में CIA एजेंट ने वांग फेंग को एक बैग सौंपा।

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अब आगे की कड़ी सिंगापुर से जुड़ती है। 11 अप्रैल 1955 को चीनी प्रधानमंत्री चाऊ एन लाई को सिंगापुर से बांडुंग रवाना होना था। चाऊ के लिए भारत से एयर इंडिया का चार्टड विमान ‘दी प्रिंसेज़’ सिंगापुर भेजा गया। लेकिन एन वक्त पर चाऊ एन लाई ने एयर इंडिया के विमान में बैठने से इनकार कर दिया। बाद में चाऊ दूसरे विमान से बर्मा (आज म्यामांर) के रास्ते बांडुंग पहुंचे। हालांकि 11 अप्रैल की तारीख को ‘दी प्रिंसेज़’ ने बिना चाऊ एन लाई के ही बांडुंग के लिए उड़ान भरी। विमान में कुछ विदेशी पत्रकार और भारतीय क्रू मेंबर सवार थे। लेकिन बीच हवाई मार्ग में ही प्लेन में जोरदार धमाका हुआ। प्लेन तीन टुकड़ों में बंट गया। हादसे में 16 लोगों की मौत हुई जबकि तीन लोग बच गए। मरने वालों में चीन, जापान, अमेरिका, वियतनाम और भारत के नागरिक शामिल थे।

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चाऊ एन लाई बच गए क्योंकि ऐन वक्त पर उन्होंने इस फ्लाइट से जाना कैंसल कर दिया था। लेकिन घटना के ठीक बाद अब शक की सुई भारत के तरफ घूमी। क्योंकि एयरक्राफ्ट भारत का था, पूरा स्टाफ भारत का था तो प्लेन में बम फिट होने की खबर से भारत कैसे अंजान था ? इस मामले में एयर इंडिया के 71 कर्मचारियों से पूछताछ भी हुई। इस बीच चीनी खूफिया सूत्रों को खबर लगी, कि इस साजिश के पीछे CIA और ताइवान की KMT का हाथ है, साथ ही भारत को इस साजिश की भनक नहीं थी।

इस तरह भारत के माथे पर न सिर्फ कलंक लगने से बच गया, बल्कि दोनों देशों के बीच महायुद्ध भी टल गया। हालांकि परत दर परत मामले की जांच के बाद चौंकाने वाले खुलासे सामने आए। दरअसल दिल्ली में CIA एजेंट ने KMT पार्टी के सदस्य वांग फेंग को जो बैग सौंपा था उसमें टाइम बम था। इसी बम को सिंगापुर में प्लेन के ह्वील बे में फिट किया गया था। हालांकि पूरी तरह ये जांच कभी अंतिम नतीजे पर नहीं पहुंच पाई। इन घटनाओं के बाद भी आखिरकार बांडुंग सम्मेलन आयोजित हुआ जो आगे चलकर गुटनिरपेक्ष आंदोलन यानी नॉन एलायन मूवमेंट की बुनियाद बना।

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