आप भारत के नागरिक हैं, लेकिन इसी देश के एक हिस्से के आप नागरिक नहीं है। उस सूबे के नागरिक भारत के तो नागरिक हैं, लेकिन उनका अपना अलग झंडा है और अलग कानून भी। यही सब अधिकार इस राज्य को विशेष राज्य बनाते हैं। आप समझ तो गए ही होंगे, कि बात जम्मू-कश्मीर की हो रही है, जिसे धरती का स्वर्ग कहा जाता है। लेकिन ये इलाका इन दिनों नर्क बन चुका है और सत्ताधारी दल बीजेपी इसकी एक बड़ी वजह इसी धारा-35A को बताता है।

धरती का स्वर्ग जम्मू कश्मीर

धारा 35-A क्या है, इसे समझने से पहले धारा-370 को समझ लीजिए। इसी धारा के तहत जम्मू-कश्मीर को कुछ विशेषाधिकार मिले हुए हैं। मसलन भारत के दूसरे हिस्सों के लोग जम्मू-कश्मीर में जमीन नहीं खरीद सकते। जम्मू-कश्मीर का अपना अलग झंडा है। भारत की संसद में बने कानून इस हिस्से पर लागू नहीं होते (रक्षा, विदेश मामले और संचार के कानूनों को छोड़कर)। यहां न तो धारा356 लागू होती थी और न ही वित्तीय आपातकाल लगाने वाली धारा 360 लागू होती है। राष्ट्रपति के पास राज्य के संविधान को बर्खास्त करने का अधिकार भी नहीं है।

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भारत के साथ जम्मू कश्मीर का झंडा

हालांकि इससे पहले और भी कई अधिकार इस राज्य को हासिल थे, जिन्हें वक्त वक्त पर बदला गया। जैसे 1965 तक जम्मू-कश्मीर में राज्यपाल को सदर-ए-रियासत और सीएम को प्रधानमंत्री कहकर संबोधित किया जाता था। इनमें बदलाव किया गया और 1964 में संविधान संशोधन कर अनुच्छेद 356 और 357 को जम्मू-कश्मीर राज्य पर भी लागू कर दिया गया, इसके बाद अब जम्मू-कश्मीर में संवैधानिक व्यवस्था बिगड़ने पर राष्ट्रपति का शासन लागू किया जा सकता है।

Demo pic- प्रदर्शन करते रिफ्यूजी

अब बात धारा 35A की। इसे तत्कालीन नेहरू सरकार ने 1954 में एक अध्यादेश लाकर इसके प्रावधानों को लागू किया था। इन प्रावधानों के तहत जम्मू-कश्मीर के बाहर का कोई भी शख्स यहां न तो नौकरी कर सकता और न ही कोई प्रॉपर्टी खरीद सकता है। यहां राज्य सरकार के शिक्षण संस्थानों में बाहरी छात्र भी पढ़ाई नहीं कर सकते। सबसे चौंकाने वाली बात ये है, कि कश्मीर की कोई भी लड़की किसी बाहरी से शादी नहीं कर सकती। कर ले, तो उसकी राज्य से नागरिकता खत्म हो जाती है।

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Demo pic- सदन को संबोधित करते नेहरू

पंडित जवाहरलाल नेहरू ने 27 नवंबर 1963 को संसद में धारा 370 और 35ए के बारे में कहा था, कि ‘यह अनुच्छेद घिसते-घिसते, घिस जाएगा’। लेकिन आज इसके खात्मे या बदलाव की जब भी बात उठती है, तो जम्मू-कश्मीर के नेताओं के पेट में मरोड़ उठने लगती है और वो इसके विरोध में चिल्लाना शुरू कर देते हैं, जैसे फारुक अब्दुल्ला और मेहबूबा मुफ्ती अभी चिल्ला रही हैं। आपको बता दें, कि डॉ. भीमराव अंबेडकर भी जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा देने के खिलाफ थे।

जम्मू कश्नीर की सीएम महबूबा मुफ्ती

इसी विवादित धारा की वजह से वहां कई स्थानीय निवासी आज भी रिफ्यूजी की जिंदगी जी रहे हैं। 1947 में जब भारत और पाकिस्तान के बीच बंटवारा हुआ, तो इस दौरान लाखों लोग शरणार्थी बनकर भारत आए। और ये लोग देश के कई हिस्सों में बसे, जो एक वक्त बाद वहां के स्थायी निवासी कहलाने लगे। लेकिन जम्मू-कश्मीर में तब बसे नागरिकों की चौथी-पांचवी पीढ़ी भी शरणार्थी ही कहलाती है और ये तमाम मौलिक अधिकारों से वंचित हैं। इन्हें न तो स्थानीय चुनावों में वोट डालने का अधिकार मिला है और न ही सरकारी कॉलेज में पढ़ाई का। ये सरकारी नौकरी के लिए आवेदन भी नहीं कर सकते हैं। एक आंकड़ें के मुताबिक जम्मू-कश्मीर में ऐसे लगभग डेढ़ लाख शरणार्थी हैं, जो सालों से राज्य की नागरिकता पाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं।

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देश के एक सूबे में हो रहे इसी भेदभाव को खत्म करने के लिए 2014 में ‘वी द सिटिजंस’ नाम की एक NGO ने एक रिट याचिका दायर की है, जिसमें धारा-35A को खत्म करने की मांग की गई है। जो सुप्रीम कोर्ट में लंबित है, जिसपर कोर्ट सुनवाई के लिए तैयार हो गया है।

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