‘कितना है बदनसीब जफर दफ्न के लिए, दो गज जमीं भी न मिली कू-ए-यार में’।

ये दर्द सिर्फ रंगून में निर्वासन झेल रहे आखिरी मुगल बादशाह बहादुरशाह जफर का ही नहीं था, बल्कि जम्मू-कश्मीर के महाराजा हरि सिंह डोगरा का भी था। महाराजा का अपनी ही सरजमीं से निर्वासन शायद आजाद भारत में तुष्टीकरण की राजनीति का आगाज था। एक तरफ जम्मू-कश्मीर का भारत में विलय करने वाले महाराजा हरि सिंह पर शेख अब्दुल्लाह के वशीभूत तत्कालीन सरकार भारत का दबाव बढ़ता जा रहा था, तो दूसरी तरफ पाकिस्तान से मिलीभगत कर भारत के खिलाफ विद्रोह की साजिश रच रहे हैदराबाद के निजाम उस्मान अली पर पटेल को कार्रवाई करने से रोकने की कोशिश की जा रही थी। एक तरफ महाराजा हरि सिंह को अपनी जन्मभूमि-कर्मभूमि को छोड़कर मुंबई(तब बंबई) जाने के लिए मजबूर किया गया, तो दूसरी तरफ भारत के विद्रोही निजाम को हैदराबाद के राजप्रमुख के पद से नवाजा गया।

महाराजा-हरि-सिंह-23-सितंबर-1895-अप्रैल-1961

वैसे तो जम्मू-कश्मीर रियासत और महाराजा के बारे में बहुत कुछ कहा और लिखा जा चुका है। लेकिन तारीख का तक़ाज़ा एक बार फिर महाराजा हरि सिंह के अनछुए पहलुओं को छूने की हिमायत कर रहा है। दरअसल 23 सितंबर 2017 को महाराजा की 123वीं जयंती मनाई गई। महाराजा के जन्मदिन पर जम्मू-कश्मीर में पब्लिक हॉलीडे घोषित किए जाने को लेकर राज्य में खूब राजनैतिक शोरशराबा हुआ। वहीं 26 अक्टूबर की तारीख भी नजदीक है, ये वही तारीख है जब आजादी के ठीक दो महीने बाद महाराजा ने जम्मू-कश्मीर रियासत का भारत में विलय किया। लिहाजा इस मौके पर कुछ बातें उस शख्सियत पर जिसके साथ सिर्फ अपनों ने ही नहीं बल्कि इतिहास ने भी बहुत अन्याय किया।

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जम्मू-कश्मीर-का-विलय-पत्र

ये महाराजा हरि सिंह का दुर्भाग्य था, कि उनके रियासत की भौगोलिक सीमा सोवियत संघ, अफगानिस्तान, तिब्बत और चीन से लगती थी। इससे भी बड़ा दुर्भाग्य शायद यह था, कि उनके शासनकाल में एक ऐसा वक्त आया जब द्वितिय विश्वयुद्ध समाप्त हो चुका था और शीत युद्ध परवान चढ़ रहा था। इन तमाम मिश्रित कारणों की वजह से महाराजा और उनकी रियासत घरेलू और अंतरराष्ट्रीय षडयंत्रों का शिकार हो रही थी।

जम्मू के इसी अमर पैलेस में महाराजा हरि सिंह का जन्म हुआ

अफसोस, कि इतिहास में कई जगह महाराजा हरि सिंह को भारतीय एकता और अखंडता के विरोधी के तौर पर प्रचारित किया जाता है। लेकिन ऐसा दुष्प्रचार करने वाले शायद ये भूल जाते हैं, कि 1931 में लंदन गोलमेज सम्मेलन में बतौर नरेंद्रमंडल अध्यक्ष महाराजा भारतीय स्वतंत्रता के प्रबल पैरोकारों में से एक थे।

महाराजा हरि सिंह

महाराजा हरि सिंह को इतिहास में कई जगह सामंती और साम्प्रदायिक राजा के तौर पर भी प्रचारित किया जाता है। लेकिन ये प्रचार भी सिवाय मिथ्या के कुछ नहीं। क्योंकि सच्चाई यह है, कि महाराजा हरि सिंह अपने समय के प्रगतिशील विचारों वाले सुधारवादी कार्यक्रमों को प्रोत्साहित करने वाले प्रशासक थे। उन्होंने बिना किसी धार्मिक भेदभाव के अपनी रियासत में सभी के लिए नि:शुल्क प्राथमिक शिक्षा की व्यवस्था की। छात्रों के लिए स्कॉलरशिप शुरु की गई। बाल विवाह,  सती प्रथा, छूआछूत को कानूनन खत्म किया गया। लोकतांत्रिक मूल्यों को मजबूत करने के लिए प्रजा सभा के नाम से विधानसभा का गठन किया गया। न्यायिक प्रक्रिया को मजबूत करने के लिए हाईकोर्ट स्थापित किया गया। मंदिरों के दरवाजे दलितों के लिए खोले गए, खुद महाराजा ने उनके साथ पूजा-अर्चना की। राजपूतों को खेती के लिए प्रोत्साहित करने के मकसद से महाराजा हल लेकर खुद खेत पहुंचे। इसके अलावा महाराजा हरि सिंह ने अपनी रियाया(प्रजा) और रियासत के लिए कई क्रांतिकारी कदम उठाए।

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सरदार पटेल के साथ महाराजा हरि सिंह

आज भारत अंतरराष्ट्रीय मंचों पर सीना ठोंक-ठोंक कर जिस जम्मू-कश्मीर को भारत का अभिन्न अंग बताता है, उसके पीछे महाराजा हरि सिंह के हस्ताक्षर वाला विलय पत्र ही सबसे बड़ा सबूत है। लेकिन रियासत के भारत में विलय के लिए भी महाराजा को अपमान का घूंट पीना पड़ा। तत्कालीन प्रधानमंत्री ने महाराजा के सामने शर्त रख दी, कि रियासत का भारत में विलय तभी मंजूर किया जाएगा शक्ति शेख अब्दुल्ला को सौंपी जाएगी। आखिरकर महाराजा को शेख अब्दुल्ला को रियासत का आपातकालीन प्रशासक बनाना पड़ा। ये तरीका रियासत के भारत में विलय को लोकतांत्रिक रूप देने के लिए अख्तियार किया गया था या फिर शेख के शह पर। तस्वीर धुंधली थी, क्योंकि ये प्रक्रिया बाकी के पांच सौ से ज्यादा रियासतों के भारत में विलय के दरमियान कहीं भी नहीं अपनाई गई थी। लेकिन ये स्वांग फिर भी लोकतांत्रिक नहीं था,  क्योंकि बिना किसी लोकतांत्रिक पद्धति या चुनाव के जिस शेख अब्दुल्ला को सत्ता की चाबी सौंपी गई, वे तो विधानसभा के सदस्य भी नहीं थे। वे जम्मू संभाग के नेता भी नहीं थे। वह गिलगिट और बाल्टिस्तान के नेता भी नहीं थे, क्योंकि वहां भी ज्यादातर शियाओं की आबादी थी। शेख लद्दाख के बौद्धों का भी प्रतिनिधित्व नहीं करते थे। शेख अब्दुल्लाह केवल कश्मीर घाटी के कौशुर बोलने वाले मुसलमानों के नेता थे। लेकिन फिर भी शेख के सपनों को साकार करने के लिए जम्मू और लद्दाख को एक तरह से कश्मीर का उपनिवेश बना दिया गया।

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जवाहरलाल नेहरू और शेख अबदुल्ला

बहरहाल तत्कालीन भारत सरकार और शेख अब्दुल्लाह के षडयंत्रों से अजीज आ चुके महाराजा को सबसे गहरा आघात अपने टाइगर(महाराजा अपने पुत्र को प्यार से टाइगर कहा करते थे) से मिला। शेख अब्दुल्ला जब केंद्र सरकार की मदद से महाराजा को जम्मू-कश्मीर से बाहर निकालने का षडयंत्र रच रहे थे, उस समय महाराजा के प्रिय टाइगर को भी मोहरा बनाने की कोशिश की गई। दरअसल महाराजा को रियासत से बाहर निकालने से पहले उनकी गैरमौजूदगी में उनका कोई प्रतिनिधि तलाशना जरुरी था। ऐसे वक्त में टाइगर(युवराज कर्ण सिंह) ने तत्कालीन प्रधानमंत्री और शेख के कहने पर प्रतिनिधि बनना स्वीकार कर लिया और इस तरह महाराजा हरी सिंह को उनकी रियासत से मुंबई(तब बबंई) तड़ीपार कर दिया गया। माना जाता है की अगर टाइगर महाराजा का प्रितिनिधि बनने से इनकार कर देते तो, शेख के लिए महाराजा को निष्कासित करना आसान नहीं होता। इस तरह 26 अप्रैल 1961 को मुंबई में गुमनामी के अंधेरे में महाराजा हरि सिंह डोगरा ने आखिरी सांस ली। कहते हैं, टाइगर से महाराजा इतने दुखी हो गए थे, कि उन्होंने अपनी मौत के बाद अंतिम संस्कार तक उनके हाथों नहीं कराने का वादा अपने परिजनों से ले लिया था।

तत्कालीन सीएम बख्शी गुलाम मुहम्मद के साथ सदर-ए-रियासत कर्ण सिंह

महाराजा हरि सिंह को इतिहास में अलग-अलग चश्में से देखा गया लेकिन इस लेख में उन पहलुओं को उजागर करने की कोशिश की गई, जिन्हें इतिहास के कब्र से बाहर निकालना कभी मुफीद नहीं समझा गया। ये लेखक के निजी विचार हैं, हो सकता है बहुत से पाठक इस लेख के कुछ बिंदुओं से सहमत न हो ऐसे पाठकों की टिपप्णियों का भी तहे दिल से स्वागत है।

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1 COMMENT

  1. Itihas ko chand navabo ke chamcho ne likha hai ……..itihas ko fir se likhane ki jarurat hai … In chamcho ne dirf apne niji swarth tatha paiso ki lalah me muslman sashko ke bare mein bhut badha chadha ke likha hai…..lanat hai aise itihas lekhko per….

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