अगले हफ्ते प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इजरायल के दौरे पर जाने वाले हैं। आप कहेंगे इसमें नया क्या है। प्रधानमंत्री तो दुनिया घूम रहे हैं, इस देश में ऐसा क्या खास है ? तो खास ये है, कि मोदी आजाद भारत की 70 साल की उम्र में इजरायल जाने वाले पहले पीएम हैं। अब आप सोच रहे होंगे, कि इतने बरस तक देश का कोई पीएम इस देश के दौरे पर क्यों नहीं गया ? तो इसके लिए आपको इजरायल के बारे में थोड़ा पढ़ना पड़ेगा। लेकिन हम आपको एक ऐसे राष्ट्राध्यक्ष की कहानी बताने जा रहे हैं, जो इस देश की यात्रा पर गया तो उसके ही देश की आर्मी ने उसे सरेराह मौत के घाट उतार दिया

कहते हैं, कि आप दोस्त बदल सकते हैं, लेकिन पड़ोसी नहीं। इसलिए भलाई इसी में है, कि पड़ोसी से रिश्ते सुधार लें। भारत ये कोशिशें 70 सालों से कर रहा है। पर नादान पाकिस्तान है, कि समझता ही नहीं, लेकिन मध्यपूर्व एशिया में दो ऐसे पड़ोसी हैं, जिन्होंने कड़वाहट को भुलाकर संबंध सुधारने की कोशिश की थी। हालांकि इसकी कीमत एक देश के राष्ट्रपति को अपनी जान देकर चुकानी पड़ी।अरबों की भूमि में इज़रायल नाम का यहूदी राज्य हमेशा से अरब जगत की आंखों में किरकिरी रहा। 1948 में अस्तित्व में आने के बाद छोटा सा देश इज़रायल 1973 तक चार-चार जंगों में मिस्र, जॉर्डन, सीरिया, लेबनान और इराक जैसे देशों को धूल चटा चुका था। 1948, 1956, 1967, 1973 की जंग में इज़रायल की विजय से पूरी दुनिया चकित थी, लेकिन अरब देश अब भी इज़रायल को सबक सिखाने पर आमादा था। अब तक किसी भी अरब देशों ने इज़रायल को मान्यता नहीं दी थी, लेकिन अरब देशों के गुट से अलग मिस्त्र (इजिप्ट) इज़रायल से युद्ध कर आजीज आ चुका था, लिहाजा 19 नवंबर 1977 को देश के मुखिया अनवर सादात ने इज़रायल का ऐतिहासिक दौरा किया।

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मिस्त्र के राष्ट्रपति अनवर(बाएं) सादात,इस्राइली पीएम मेनाख़म बेगिन(दाएं) बीच में यूएस प्रेसिडेंट जिम्मी कार्टर(कैंप डेविड समझौता 1979)

26 मार्च 1979 को अमेरिका के कैम्प डेविड में तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति जिम्मी कार्टर की मौजूदगी में मिस्त्र के राष्ट्रपति अनवर सादात और इस्राइली प्रधानमंत्री मेनाख़म बेगिन के बीच कैम्प डेविड समझौता हुआ। अनवर सादात ने अरब जगत के विरोध के बावजूद इज़रायल को मान्यता दी, लेकिन इज़रायल से मिस्र की करीबी केवल अरब जगत को ही नहीं बल्कि मिस्र के अंदर ही कुछ कट्टरपंथी तत्वों के गले नहीं उतर रही थी।

अनवर सादात ने सीमा पर शांति और देश की तरक्की के लिए अरब जगत के विरोध के बावजूद इज़रायल से संबंधों को नया मोड़ देने की कोशिश की। लेकिन इस कोशिश में अनवर खुद एक दिन ऐसे मोड़ पर आ गए, जिसके बारे में शायद उन्होंने कल्पना भी नहीं की होगी। 6 अक्टूबर 1981 का दिन था, राजधानी काहिरा में राष्ट्रपति अनवर सादात फौजी परेड का निरिक्षण कर रहे थे। अनवर आसमान की तरफ टकटकी लगाए जंगी जहाजों के हरतंगेज करतब देख रहे थे, तभी सादात पर उनके ही कुछ सैनिकों ने ग्रेनेड फेंके। सादात और उनके सुरक्षाकर्मी जब तक कुछ समझ पाते इससे पहले सामने खड़े एक फौजी ट्रक से कुछ सैनिक बाहर कूदे और गोलियां बरसानी शुरु कर दीं। इस हमले में अनवर सादात समेत कुछ विदेशी डिप्लोमेट भी मारे गए।

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6 अक्टूबर 1981 को काहिरा में इसी हमले में अनवर सादात की मौत हुई

घटना के तुरंत बाद मिस्र में आपातकाल लगा दिया गया और होस्नी मुबारक मिस्त्र के नए राष्ट्रपति बने। इस तरह अनवर सादात को इस्राएल से संबंधों की कीमत अपनी जान देकर चुकानी पड़ी। पश्चिम एशिया में इज़रायल को लेकर अरब जगत की सोच में आज भी बड़ा बदलाव नहीं आया है, लेकिन इज़रायल से कई बार दांत खट्टे करवा चुके देश अब खुल्लम खुल्ला उसके खिलाफ मोर्चा खोलने की हिमाकत भी नहीं कर पाते।

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