इजरायल के साथ रिश्तों की नई इबारत लिखकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी स्वदेश लौट चुके हैं, लेकिन ये फासला तय करने में भारत को 70 बरस लग गए। कहते हैं मित्र वही जो मुसीबत में काम आए। बात 1962 के भारत चीन जंग की हो, 1971 के बांग्लादेश युद्ध की या फिर 1999 के करगिल युद्ध की, इजरायल एकमात्र ऐसा देश रहा है, जिसने जुबानी समर्थन के बजाय भारत को जंग के लिए जरूरी साजो सामान मुहैया करवाए, लेकिन फिर भी ऐसे मित्र को खुलेआम गले लगाने में इतने बरस क्यों लग गए? क्या वोट बैंक की घरेलु राजनीति भारत को ऐसा करने से रोक रही था, या फिर भारत अरब जगत की नाराजगी नहीं मोल लेना चाहता था?

वैसे तो 17 सितंबर 1950 को भारत ने इजरायल को सीमित तौर पर मान्यता दे दी थी, लेकिन भारत का फिलिस्तिन प्रेम जगजाहिर था। इसे दो उदाहरणों से समझा जा सकता है। 26 नवंबर 1938 को हरिजन पत्रिका के एक लेख में महात्मा गांधी ने यहूदियों से सहानभूति जताते हुए भी उनके लिए होमलैंड (अलग देश) की मांग को खारिज कर दिया था। दूसरा वाक्या 29 नंवबर 1947 का है। इजरायल के भविष्य पर संयुक्त राष्ट्र में वोटिंग होनी थी, तब भारत  का समर्थन जुटाने के लिए 13 जून 1947 को दुनिया के महान वैज्ञानिक और पंडित नेहरु के अच्छे मित्र अल्बर्ड आइंस्टाइन ने उन्हें चार पन्नों का एक खत लिखा था। खत में यहूदियों के साथ हुए अत्याचार का जिक्र करते हुए उनके ऐतिहासिक संदर्भों के परिप्रेक्ष्य में भारत का समर्थन मांगा था। करीब एक महीने बाद 11 जुलाई 1947 नेहरू ने खत का जवाब देते हुए कहा, कि ‘आप अरबों को उनकी मर्जी के खिलाफ अपनी मांगे मनवाने के लिए दबाव क्यों डाल रहे हैं”।  खत के जवाब से भारत का स्टैंड साफ हो चुका था। हुआ भी कुछ ऐसा ही। संयुक्त राष्ट्र में वोटिंग के दौरान भारत ने इजरायल के खिलाफ वोट किया।

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वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टाइन (बाएं) जवाहरलाल नेहरू (दाएं)

15 साल बाद वक्त ने ऐसी करवट बदली, कि भारत को उसी इजरायल की जरूरत पड़ गई। जिसके खिलाफ उसने यूएन में वोट किया था। अक्टूबर 1962 में चीन ने भारत के खिलाफ जंग छेड़ दी। भारत ने उम्मीद भरी नजरों से इजरायल की तरफ देखा। इजरायल ने भी 15 साल पुरानी बातों को भूलकर भारत को नाउम्मीद नहीं होने दिया, लेकिन अचानक एक पेंच फंस गया। दरअसल हुआ यूं, कि भारत ने इजरायल से सैनिक साजो-सामान तो मांगा, लेकिन साथ ही एक शर्त भी रख दी। शर्त ये, कि जिस जहाज से हथियार आएंगे उस जहाज में इजरायल का झंडा नहीं लगा होगा। दूसरी शर्त ये थी, कि इजरायली हथियारों पर मेड-इन-इजरायल का मार्का नहीं होगा। दूसरी शर्त से इजरायल को कोई गुरेज नहीं था, लेकिन पहली शर्त इजरायल मानने को तैयार नहीं था। हालांकि बाद में नेहरु ने झंडे वाली शर्त हटा दी और इस तरह जंगी साजों सामान इजरायली शिप से भारत पहुंचा।

इस घटना के 9 साल बाद एक बार फिर 1971 में बांग्लादेश युद्ध के समय इंदिरा गांधी ने इजरायल से मदद मांगी और इजरायल ने भी बढ़ चढ़कर भारत की मदद की। याद रखे, कि इजरायल अमेरिका का विश्वस्त सहयोगी है। 1971 की लड़ाई में तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन ने अपना जहाजी बेड़ा भेज कर भारत को धमकाने की कोशिश की, लेकिन बावजूद इसके इजरायल ने भारत का सहयोग किया।

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हालांकि इजरायल की इस दरियादिली के बावजूद फिलिस्तीन को लेकर भारत की नीति में कोई बदलाव नहीं आया था। इजरायल से रिश्ता भारत की मजबूरी तो थी, लेकिन मानो नाजायज रिश्तों की तरह इजरायल से दोस्ती को भारत दुनिया के सामने लाने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था। बहरहाल भारत में भी राजनीति ने करवट बदली। इमरजेंसी के खात्मे के साथ ही देश में आम चुनाव हुए और देश में पहली बार जनता पार्टी की अगुवाई में गैरकांग्रेसी सरकार बनी। मोरारजी भाई देसाई देश के प्रधानमंत्री बने और अटल बिहारी वाजपेयी विदेश मंत्री।

जनता पार्टी की सरकार बनते ही इजरायल को लेकर विदेश नीति में बदलाव की कवायद शुरु हुई। प्रधानमंत्री कार्यालय और भारतीय खुफिया एंजेसियों ने इजरायल के साथ संबंधों को मजबूत करने के लिए एक सिक्रेट प्लान तैयार किया। साल 1978 में इजरायल के रक्षा मंत्री जनरल मोशे ड्यान गुप्त रुप से भारत की यात्रा पर आए। भारत-इजरायल के बीच नए रक्षा संबंधों को लेकर बात आगे ही बढ़ी थी, कि इसी बीच इजरायली रक्षा मंत्री जनरल मोशे ड्यान की भारत यात्रा की खबर मीडिया में लीक हो गई और इस सिक्रेट यात्रा का फिलिस्तिन भेद गया और समूचे अरब जगत में इस यात्रा को लेकर शंकाए उभरने लगी और इस तरह भारत-इजरायल संबंधो को बढ़ाने की प्रक्रिया पर पानी फिर गया।

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1978 में भारत की गुपचुप यात्रा करने वाले इजरायली रक्षा मंत्री मोशे ड्यान

वक्त ने फिर करवट बदली, ये दौर नब्बे के दशक का था, सोवियत संघ बिखर चुका था। भारत में उदारीकरण का दौर शुरु हो चुका था। इस बीच 29 जनवरी 1992 को तत्कालीन प्रधानमंत्री पीवी नरसिंहराव ने इजरायल को कूटनीतिक तौर पर मान्यता दे दी और इस तरह भारत इजरायल के बीच पहली बार डिप्लोमैटिक स्तर पर संबंध स्थापित हुए। हालांकि इसके बारे में भी कहा जाता है, कि इसके पीछे अमेरिकी दबाव भी काम कर रहा था। साथ ही ये भी माना जाता है, कि तत्कालीन भारत सरकार ने इजरायल से डिप्लोमैटिक संबंध बनाने से पहले फिलिस्तिन के नेता यासर अराफात से विमर्श किया था। बहरहाल सात साल बाद फिर 1999 में भारत-पाक के बीच कारगिल की जंग छिड़ गई और इस लड़ाई में भी इजरायल ने भारत का भरपूर साथ दिया।

भारत ने 1950 में इजरायल को सीमित तौर पर मान्यता दी उसके बाद 1992 में डिप्लोमैटिक संबंध कायम करने तक भारत को 42 साल लग गए। इसके बाद 25 साल और लग गए खुल्लम खुल्ला दोस्ती का इजहार कर अपने एक विश्वस्त सहयोगी को दुनिया के सामने गले लगाने में। 70 साल में पहली बार नरेंद्र मोदी के रूप में किसी भारतीय प्रधानमंत्री ने इजरायल का दौरा कर घिसीपिटी रवायतों और वोटबैंक पॉलिटिक्स को दरकिनार करते हुए भारतीय विदेश नीति के अध्याय में नया आयाम जोड़ा।

नरेंद्र मोदी और इजरायली पीएम बेंजामिन नेतन्याहू गले मिलते हुए

 

 

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