मध्यपूर्व या कहें पश्चिम एशिया  में स्थित इजरायल 1948 में अपने उद्भव के साथ ही दुनिया के अशांत इलाकों में से एक रहा है। इजरायल फिलिस्तीन की दुश्मनी की मिसाल के आगे भारत-पाक की दुश्मनी भी फीकी पड़ जाती है। अरबों की सरजमीं पर यहूदी राज्य शुरु से ही अरब जगत की आंखों में चुभता रहा। 14 मई 1948 का अधिकारिक तौर पर इजरायल नाम का देश अस्तित्व में आया। अभी जश्न की शुरुआत भी नहीं हुई थी, कि अगले ही दिन मिस्त्र, इराक, लीरिया, जॉर्डन लेबनान ने मिलकर एक दिन पहले बने देश में जोरदार आक्रमण कर दिया। हालांकि इजरायल को हल्के में लेने की कीमत इन सभी देशों को चुकानी पड़ी। इस युद्ध में इजरायल की सैन्य क्षमता और आक्रामकता को देख कर दुनिया दंग रह गई। इसके बाद 1956,67 और 73 में एक के बाद एक चार जंगो में अरब जगत ने इजरायल के अपराजेयता के आगे घुटने टेक दिए। जंग से कुछ हासिल नहीं होना ये बात सबसे पहले मिस्त्र ने समझी। वहां के राष्ट्रपति अनवर सादात ने इजरायल से शांति समझौता किया, लेकिन इसकी कीमत उन्हें जान देकर चुकानी पड़ी।

जरुर पढ़ें:  एक नवाब जो संडास से चलाता था अपना राज-पाट
मिस्त्र के राष्ट्रपति अनवर(बाएं) सादात,इस्राइली पीएम मेनाख़म बेगिन(दाएं) बीच में यूएस प्रेसिडेंट जिम्मी कार्टर (कैंप डेविड समझौता 1979)

इतिहास गवाह है की दुनिया में धार्मिक, नस्लीय और उग्रराष्ट्रवाद के खिलाफ किसी ने आवाज उठाई, तो उसे उसकी ही सरजमीं के चरमपंथियों ने मौत के घाट उतार दिया। अमेरिका में कुछ लोग लिंकन से नाराज थे, तो गोरे काले के मसले पर कैनेडी भी चरमपंथियों के निशाने पर थे, भारत-पाक बंटवारे के समय या उसके बाद पाकिस्तान को उसका फंड लौटाने को लेकर गांधी के अनशन पर भी उग्रराष्ट्रवादियों की क्या प्रतिक्रिया था और इन सभी नेताओं का अंत कैसे हुआ इतिहास की तारीख में दर्ज है। मध्यपूर्व में भी अरब राष्ट्रों को चार-चार युद्धों में शिक्सत देने के बाद भी इजरायल ये समझ चुका था की फिलिस्तीन से शांति स्थापित करने का दूसरा  कोई विकल्प नहीं। फिलिस्तीनी पीएलओ भी अब गुरिल्ला और छापामार युद्ध करते-करते थक चुके थे।दोनों पक्ष गोला-बारूद के बजाय बातचीत की मेज पर लाइन ऑफ पीस खींचना चाहते थे।

लिहाजा दोनों पक्षों ने बातचीत के लिए सकारात्मक माहौल तैयार करना शुरु कर दिया। 9 सितंबर 1993 को यित्जाक रॉबिन को यासिर अराफात का खत मिला। इस ऐतिहासिक खत में फिलिस्तीन ने इजरायल को बतौर एक राष्ट्र मान्यता दे दी। राबिन ने भी ठीक उसी दिन फिलिस्तीन को उस खत का जवाब दिया जिसमें इजरायल की ओर से फिलिस्तीन को भी एक देश के रुप में मान्यता दे दी गई। इस पत्र व्यवहार के ठीक चार दिन बाद 13 सितंबर 1993 को वॉशिंगटन डीसी के पास केंप डेविड में दोनों नेता आमने-सामने हुए। अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन की मौजूदगी में इजरायली प्रधानमंत्री यित्जाक राबिन और फिलिस्तीनी पीएलओ नेता यासिर अराफात ने ऐतिहासिक ऑस्लो एकॉर्ड साइन किया। दोनों देशों ने आधिकारिक तौर पर एक दूसरे को मान्यता दे दी। इसके साथ ही एक दूसरे पर हमला न करने और शांति बनाए रखने पर भी सहमति बनी।

जरुर पढ़ें:  एक नवाब, जो अपने अजीब शौक की वजह से दुनिया में सुर्खियों में रहा
ऐतिहासिक ऑस्लो अकॉर्ड में साइन करने के बाद हाथ मिलाते राबिन(बाएं) और आराफात(दाएं) बीच में यूएस प्रेसिडेंट क्लिंकटन

इधर ऑस्लो अकॉर्ड साइन हुआ उधर इजरायल में कुछ कट्टरपंथी यहूदियों ने इसका विरोध शुरु कर दिया। लेकिन रॉबिन ने साफ कर दिया की वो अपने पड़ोसी के साथ आगे किसी तरह का तनाव नहीं चाहते। साल 1994 में यासर अराफात और यित्जाक राबिन को ऑस्लो अकॉर्ड के लिए संयुक्त रूप से नोबल शांति पुरस्कार मिला। इधर सीमाओं में संबंधों की बर्फ पिघल रही थी उधर इजरायल में ही कुछ लोगों में राबिन की इस शांति और भाइचारे की मुहीम को लेकर नाराजगी बढ़ रही थी।

1994 में नोबल प्राइज़ के साथ PLO चेयरमेन यासिर आराफात(बाएं)इजरायली राष्ट्रपति शिमॉन प्रेज़(बीच) यित्जाक राबिन (दाएं)

4 नंवबर 1995 का दिन था,इजरायल की राजधानी तेल-अवीव के किंग्स ऑफ इजरायल स्कवॉयर में राबिन एक विशाल सभा को संबोधित कर रहे थे। सभा खत्म हुई राबिन हाल से बाहर निकलकर अपने कार की तरफ बढ़ रहे थे। अभी कार का दरवाजा खोला ही था, कि भीड़ में मौजूद यीगल अमीर नाम के एक शख्स ने यित्जाक रॉबिन पर एक के बाद एक तीन गोलियां चला दी।

जरुर पढ़ें:  इतिहास का एक बेरहम राजा, जिसकी 1000 से ज्यादा औलादें थी और 500 से ज्यादा रखैल
यित्जाक राबिन पर फायरिंग की तस्वीर

दो गोली राबिन को लगी। बुरी तरह जख्मी हालत में राबिन को पास के ही अस्पताल में ले जाया गया। खून काफी बह चुका था और अगले चालीस मिनट में ही राबिन दम तोड़ चुके थे। 6 नवंबर को राजकीय सम्मान के साथ राबिन का माउंट हर्ज़ल में अंतिम संस्कार कर दिया गया। अमेरिका, मिस्त्र, जॉर्डन सहित दुनिया के कई देशों के राष्ट्राध्यक्ष इसमें शामिल हुए और इस तरह एक महान नेता को अपने पड़ोसी के साथ अमन और शांति की कीमत अपनी जान देकर चुकानी पड़ी।

यित्जाक राबिन की अंतिम यात्रा,शव का पास खड़े यूएस प्रेसिडेंट बिल क्लिंकटन(बाएं) उनके ठीक बगल में मिस्त्र के राष्ट्रपति होस्नी मुबारक(दाएं)

 

Loading...