तवायफ, ये नाम सुनते ही लोगों के चेहरे पर आने वाले भाव को देखकर आप समझ सकते हैं, कि इनके लिए लोगों का जेहन कैसा था। लोग अपने शौक को पूरा करने के लिए जाते तो इनके पास थे, लेकिन इनके लिए शहर के बाहर अलग इलाके होते थे। इन बदनाम गलियों से गुजरना मतलब सफेद कुर्ते पर कोई काला दाग लगा लेना। तवायफों को लेकर लोगों की सोच यही थी। उन्हें देखने का नज़रिया यही था। बॉलीवुड की कई फिल्मों में हमने तवायफों के कोठों, उन बदनाम गलियों और किरदारों को देखा है, फिल्मों में जैसा दिखाया गया असल में तवायफों की जिंदगी उससे भी दुश्वार हुआ करती थी। लेकिन क्या आप जानते हैं, कि इन तवायफों ने आजादी की लड़ाई में अपना खासा योगदान दिया था।

Pakeezah Movie poster

पुराने वक्त में राजा-महराजा मुजरे के शौक़िन हुआ करते थे। सभाएं लगाकर तवायफों का नाच होता था और तवायफों पर खूब रुपए लौटाए जाते थे। हालांकि बदनाम गलियों की इन हसीनाओं को पैसा तो खूब मिलता था, लेकिन नाम और शोहरत इनके लिए बदनामी ही थी। साल 1893 में मद्रास के गवर्नर को एक अर्ज़ी भी दी गई थी, जिसमें लिखा था, ‘तवायफों की ओर से किए जाने वाले नाच-गाने का ये गंदा धंधा बंद करवाया जाए’। 1909 में मैसूर के महाराजा ने देवदासी परंपरा को ही अवैध घोषित कर दिया था। पंजाब की प्योरिटी एसोसिएशन और मुंबई की सोशल सर्विस लीग जैसी संस्थाओं ने भी इस पर अपनी आपत्ति दर्ज कराई थी। ज़माना भले ही इन्हें हिकारत भरी निगाहों से देखता हो, लेकिन महात्मा गांधी को इनमें भी आजादी के लिए लड़ने वाली विरागंनाएं नज़र आती थीं। वो इन्हें भी उसी अवाम का हिस्सा मानते थे, जो आजादी की लड़ाई में उनकी साथ थी।

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Gauhar Jaan

बात साल 1920 की है। कलकत्ता की गौहर जान बेहद मशहूर तवायफ थीं। उन्होंने क्लासिकल संगीत को कोठे से बाहर निकालकर ग्रामोफ़ोन रिकॉर्ड के ज़रिए लोगों तक पहुंचा रही थीं। महात्मा गांधी की सोच से वो प्रभावित भी थीं। इसीलिए उन्होंने गांधी की सोच पर चलने का फैसला किया था। इसका नतीजा ये रहा, कि सभी तवायफों ने मिलकर 1921 में ‘तवायफ संघ’ बनाया और गांधी जी के असहयोग आंदोलन को इसके ज़रिए अपना समर्थन दिया।

1920 में गांधी स्वराज आंदोलन कर रहे थे। वो समझते थे, कि आन्दोलन की जनसभाओं में संगीत का क्या महत्व है। राजनीति के काम और स्वराज आंदोलन के लिए फंड इकठ्ठा करने के सिलसिले में वो कलकत्ता गए हुए थे। आंदोलन बड़ा था तो फण्ड भी ज़्यादा चाहिए था। इसी सिलसिले में महात्मा गाँधी ने गौहर जान से मदद की अपील की। उन्होंने गौहर जान को बुलवा भेजा और मुजरा कर फंड इकठ्ठा करने की बात कही। गांधी की ये बात सुनकर गौहर जान न सिर्फ खुश हुई बल्कि आश्चर्यचकित भी रह गईं। गौहर जान ने इसके लिए तुरंत हामी भर दी, लेकिन उन्होंने एक शर्त भी रखी।

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Swaraj Movement

शर्त ये थी, कि गौहर जान ने ख़ास मुजरा करेगी और उससे इकट्ठा होने वाली राशि को वो स्वराज फंड में दान दे देंगीं, लेकिन उस महफ़िल में नज़राने के तौर पर महात्मा गांधी को भी मौजूद रहना होगा। गौहर जान की ये शर्त गांधी जी मान गए, लेकिन कुछ राजनितिक कारणों की वजह से गांधी जी अपना वादा पूरा नहीं कर पाए। गांधी जी के बिना महफ़िल शुरू तो हो गई, लेकिन गौहर जान पूरी रात उनका इंतजार करते रहीं। गौहर जान को इस मुजरे से 24000 रूपए की रकम मिली थी। उस वक़्त के हिसाब से ये रुपए बहुत ज्यादा थे।

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Tawayaf presenting in front of audience

अगले दिन बापू ने अपने एक मित्र मौलाना शौकत अली को गौहर जान से चंदा लाने भेजा। गुस्से में आग बबूला गौहर जान ने 12000 रूपए देते हुए बापू पर ताना मारते हुए कहा, कि ‘आपके बापू जी ईमान और एहतराम की बातें तो काफ़ी किया करते हैं पर एक अदनी तवायफ़़ को किया वादा नहीं निभा सकते। वादे के मुताबिक वे खुद नहीं आए, लिहाज़ा स्वराज फंड आधी रकम का ही हकदार बनता है।’