दुनिया चांद और मंगल तक पहुंचने के सपने बुन रही है, लेकिन इसी दुनिया में कुछ ऐसे भी लोग मौजूद हैं, जिनकी अपनी सल्तनत है, अपने कायदे और कानून है। वो खुद को खुदा से भी ऊपर समझते हैं। बात लड़कियों या औरतों की आती है, तो लोगों की सोच आज भी 100 साल पुरानी हो जाती है। महिलाओं को अपनी जूती की धूल समझने वाले जाहिल लोग ही पुरुषप्रधान समाज को पैदा करते हैं।

राजस्थान के भीलवाड़ा के एक गांव की ये तस्वीर अपने आप में कई सवाल है। धर्म और आस्था का लबादा ओढाकर इसी समाज ने पति को परमेश्वर बना दिया है। पति को यहां सर्वोच्च आसन पर ले जाकर बिठा दिया गया है। उसे इतना ऊपर कर दिया गया है, कि पत्नियों को अपने पतियों के गंदे-फटे जूतों को अपने मुंह पर रखना पड़ता है और उससे पानी भी पीना पड़ता है। ये तस्वीर देखकर आपको घिन आ रही होगी। उस समाज की सोच पर, जिसमें आज भी ये परंपरा फल-फूल रही है।

औरत पति के लिए क्या है, इससे जुड़ी एक खबर पाकिस्तान से भी सामने आई है। पाकिस्तान के एक शख्स ने शादी तो लड़की से की, लेकिन उस लड़की का नाम बताने में उसे शर्म आती है। उसकी शादी में पहुंचे लोगों को पता ही नहीं था, कि दुल्हन का नाम क्या है? उसके सगे रिश्तेदार भी इस बात से अंजान थे, क्योंकि शादी के कार्ड में दुल्हन का नाम ही नहीं लिखा गया था। वजह थी समाज की बंदिशे और दकियानूसी सोच। लड़की को लेकर आज भी समाज की सोच नहीं बदली है, तभी एक शायर को ये लिखने पर मजबूर होना पड़ा कि,

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बाप से भी मिलती है तो शौहर से पूछ-पूछ कर

बेटी जब रुख्सत होती है, तो हक़दार बदल जाते हैं।

मामला पाकिस्तान का है, शौहर को जब बेग़म के नाम की ज़रूरत पड़ी तब वो छटपटाने लगा। बेगम के नाम की ज़रूरत ना पड़ी होती, तो ये मामला भी सुर्खियों में न आता। मामला पाकिस्तान के ख़ैबरपख्तूनख़्वा इलाके का है, जहां के चारसद्दा के रहने वाले रौफ़ ख़ान अपनी पत्नी के साथ रहना चाहते हैं, लेकिन उनकी मजबूरी ऐसी है, कि वो कुछ भी नहीं कर सकते। रौफ़ ख़ान का निकाह एक साल पहले हुआ था। पत्नी के साथ रहने की चाह रखने वाले रौफ़ ख़ान को वीज़ा नहीं मिल रहा है।

दरअसल रौफ़ ख़ान की पत्नी के पास दोहरी नागरिता है और वो पकिस्तान के बाहर रहती हैं। जब रौफ़ ख़ान ने वीजा के लिए अप्लाई किया, तो उन्हें कागजी करवाई के लिए अपने शादी का कार्ड जमा करवाना पड़ा। मामला तभी उलझा, क्योंकि रौफ साहब के शादी के कार्ड में उनका नाम तो है लेकिन दूल्हन का कॉलम खाली पड़ा है। पत्नी के नाम की जगह लिखा है- अमुक की बेटी। अब कागजी कार्यवाही में ये साफ़ करना बहुत ही मुश्किल है, कि अमुक की कौन सी बेटी के साथ रौफ़ ख़ान का निकाह हुआ है।

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BBC की रिपोर्ट के मुताबिक, पाकिस्तान के कई इलाकों में समाज की बंदिशों की वजह से शादी के कार्ड में दुल्हन का नाम ही नहीं लिखते। नाते-रिश्तेदार दुल्हन का नाम जाने इसे अच्छा नहीं माना जाता। इसी वजह से यहां बहुत कम परिवार ऐसे हैं, जो कार्ड पर पति-पत्नी दोनों का नाम लिखवाते हैं। यहां महिला की पहचान शादी के पहले अपने पिता के नाम से होती है और शादी के बाद अपने पति के नाम से। महिलाओं के पहचान पत्र भी कही-कही पर पिता या पति के नाम से बने होते हैं। महिलाओं को पकिस्तान में घर की इज़्ज़त माना जाता है और अगर घर की इज़्ज़त का नाम कोई जान ले तो इससे इज़्ज़त कम हो जाती है ऐसा माना जाता है।

कुरान और इस्लाम की आड़ लेकर महिलाओं के साथ कितनी ज्यादती होती है, ये किसी से छिपा नहीं है। भारत मेें भी तीन तलाक और हलाला के मामले को लेकर कई महिलाएं अपनी आवाज़ बुलंद कर चुकी हैं। हालांकि मु्स्लिम देश पकिस्तान में तीन तलाक पर तो बैन है, लेकिन यहां भी कट्टरपंथ का बोलाबाला है। इस्लाम के नाम पर महिलाओं पर कितनी पाबंदियां लादी गई है, इसके लिए सऊदी अरब के नियमों को देखा जा सकता है। हालांकि राहत की खबर ये है, कि अब ये कटटर मुल्क भी महिलाओं के लिए अपनी सोच के दरवाजों को खोल रहा है।

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प्रिंस मुहम्मद बिन सलमान ने कई ऐसे फैसले लिए हैं, जो महिलाओं के हित में है। प्रिंस ने महिलाओं के गाडी चलाने की पाबंदी को खत्म किया, बल्कि लड़कियों को स्कूलों में खेलने की इजाजत भी दी। नई इकॉनोमिक जोन की शुरुआत करते हुए उन्होंने महिलाओं को बीच पर जाने का बैन भी हटा दिया। साथ ही साथ अब महिलाएं फूटबाल मैच भी देखने जा सकती है और अगर वो कहीं काम करना चाहती हैं तो उन्हें किसी भी पुरुष रिश्तेदार से इज़ाज़त लेने की ज़रूरत नहीं है चाहे वो उनके पिता हो या पति या भाई या फिर कोई और पुरुष रिश्तेदार।

द्वापर युग हो या सतयुग या फिर कलयुग लड़की को हर युग में ही अग्निपरीक्षा देनी पड़ी है। औरतों को हर बार अपने आप को साबित करना पड़ा है, लेकिन इन्हीं की वजह से धर्म की स्थापना भी हुई है। कहते हैं एक कामयाब इंसान के पीछे एक औरत का ही हाथ होता है। ये बात शायद समाज और उसमें मौजूद कट्टरपंथी समझ जाए तो बेहतर है, वर्ना एक महिला के नाम का इस्तेमाल न करने की वजह से रौफ को जो सजा मिल रही है, वैसी ही कोई सजा सारे समाज को न भुगतनी पड़े।

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